सोमवार, 18 मार्च 2013


ढूंढ़ते ढूंढ़ते  जिंदगी थक गयी 
एक दिया सा कहीं रह गुजरों में था 
चलते रहे रास्तों में ता उम्र हम 
मंजिलें  तक़दीर के फ़साने में था 
सोचा न मिलूँगा उससे कभी 
मगर वो ख्वाबों के महलों में था 
भागता रहा पल- पल जिससे बचकर ...
होश में आया तो वो मेरे पहलु में था...

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