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सोमवार, 31 मई 2021

हिसाब कर लो ...

 सुनो ... 

ऐसा करो हिसाब कर लो 

क्या हमें लेना है 

क्या तुम्हे देना है 

क्या बाकी है 

ये लेन-देन अब बस करो 

कई शिकायतें हैं 

कई नाराज़गी हैं 

वो ज़ज्बात, वो अहसास 

अब बस करो 

इसकी जरुरत होगी तुम्हे 

बचा कर रखो ... 

सुनो .. 

ऐसा करो हिसाब कर लो 

कई रातें हमने आँखों में ही काटी हैं 

कई बातें हमने अपने दिल में ही रखीं हैं 

अब ये शिकायतों का मौसम 

ख़त्म होता दिख रहा  

सहेज कर रखो सुनहरी यादों को 

कम से कम वो तो अपनी है 

उसमे किसी से कोई शिकायत नहीं 

कोई गिला नहीं 

कोई नाराज़गी नहीं 

अच्छी है हमेशा रहेंगी ... 

दिल के पास रहेंगी ...

सुनो ... 

ऐसा करो अब हिसाब कर लो ....


रविवार, 31 मई 2020

बिलकूल नहीं ....

इसे तो सबको एक दिन छोड़ना ही था ... 
ये दुनिया है तेरा घर बिलकुल नहीं ... 
मज़ा तो खुद से खुद को लुटने में हैं यारों .... 
किसी और को लूटना अच्छा नहीं ... 
मेरी कोशिश से वो बदलेगा एक दिन ... 
ये मेरा वादा है, दावा बिल्कूल नहीं ... 
मिलेगा एक दिन आफताब हमें .. 
ये होसला है, ख्वाब बिलकूल नही है, 
जिसे देखकर आ जाता था चेहरे पर नूर ...
वो दिल्लगी है, दिल की लगी बिलकूल नहीं है .. 
उसने मुझे सब कुछ दिया है इस जहाँ में .. 
वो मेरी माँ है,  दूसरा कोई बिलकूल नही हैं ... 

सोमवार, 15 जुलाई 2019

गरीबी क्या होती है ...




स्कूल का चौथा पिरीअड चल रहा था हमारे क्लास रूम में धुप बड़े आराम से पैर फैला रही थी और हाँ उस समय हमारे पास कोई घडी नहीं होती थी तो हम लोगों ने धुप के निशान को अपनी घडी बनाए हुये थे, जब धुप यहाँ तक आ जाएगी तो चौथा पिरिअड ख़त्म हो जाएगा और अगर यहाँ आ जायेगी तो इंटरवल शुरू हो जायेगा और अगर धुप पिछली दिवार को छु जायेगी तो हुर्रे ...... छुट्टी हो जाएगी !

तो हाँ हमें मालूम हो गया कि बस कुछ मिनटों में टन टन टन टन टन टन टन घंटी बजेगी और हम लोगों की आधी छुट्टी हो जायेगी, हम लोग आधी छुटटी का इन्तजार करने लगे ! तभी कानों में टन टन टन टन टन टन टन घंटी की आवाज सुनायी दी और हम झूम उठे हमारे सभी साथी कैंटीन में जाने के लिए प्लानिंग करने लगे कि आज कौन पार्टी देगा और में ये सुनकर किनारे खसकने लगा और मैं स्कुल के उस कौने में पहुँचना चाहता था जहाँ कोई भी न आ सके .... दोस्तों ने मुझसे कहा कि चलो हमारे साथ चलो मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं आऊंगा मेरे पास पैसा  नहीं है और मैं कब तक तुम लोगों के द्वारा दिए गए सामान को खाऊंगा .... दोस्तों ने तंज मारा कि कम से कम १० रुपये तो जेब खर्च के लाया करो .....

मैं निरुत्तर चुप चाप वहां से बहुत जल्दी हटने की कोशिश करने लगा मैं उनको कोई जवाब नहीं देना चाहता था कि मैं जेब खर्च क्यूँ नहीं ला सकता ? मेरे दो भाई और एक बहन थी पापा दिन भर मजदूरी करने के बाद जो पैसा लाते हम सभी उसी में जो हो सकता था खाते थे अम्मा आस पड़ोस के घर में बर्तन मांजती थी तब जाकर कहीं हम लोगों का पेट किसी तरह से भर पाता था ! कई दिन तो हम केवल रोटी और सरसों का तेल चुपड़ कर नमक लगाकर खाते थे !

हमने गरीबी देखी है जी है और गरीबी से ही उठ कर आये हैं और हमें 10 रुपये के भी अंदाजा है कि वो कितना मूल्यवान होता है !



शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

गर्मी बहुत है

सुनो, 
गर्मी बहुत है 
अपने अहसासों की हवा 
को जरा और बहने दो 
यादों के पसीनों को 
और सूखने दो 
सुनो, 
गर्मी बहुत है 
गुलमोहर के फूलों 
से सड़कें पटी पड़ी हैं 
ये लाल रंग 
फूल का 
सूरज का 
अच्छा लगता है 
अपने प्यार की बरसात को 
बरसने दो 
बहुत प्यासी है धरती 
बहुत प्यासा है मन 
भीग जाने दो 
डूब जाने दो 
सुनो,
गर्मी बहुत है .... 

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

.....कल का क्या ...


आज बुरा है !!!
तो क्या हुआ ...
कल अच्छा होगा …
बहुत सुना है
बहुत गुना है
कल जरूर अच्छा होगा
और हम भागते रहे
उसी कल की  ओर
उसी अच्छे की ओर
रोज सपने देखते रहे
सँजोते रहे
बुनते रहे, गुनते रहे ...
उस अच्छे के लिए
एक एक दिन गुजरता रहा
हम इत्ते से उत्ते भी हो गए
और कल हमेशा
कल ही रहा ....
दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल …
और आज को हम
कभी भी जी न सके
इस कल के भंवर मे
उस स्वप्न के सफर मे …
उम्र के इस पड़ाव मे
जल कल कुछ नहीं है ...
तो आज को देखता हूँ
तो आज मे भी कुछ नहीं पाता हूँ
बहुत थक गया हूँ
इस कल के चक्कर मे
आज ही मे जीवन है …
कल का क्या ...
कल तो कल ही है ....

आए न आए ... 

जीवन का सफर .....

  
जीवन के आपाधापी मे
अच्छा और अच्छा होने की ललक मे
“अम्मू” से “आमोद” बनने
के सफर मे
जो भी मिला उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
साथ साथ चलते हुये
न जाने कितने स्नेह
कितने आत्मीयजन मिले
जिनका प्रतिबिंब आँखों मे
मेरी साँसों मे, खून मे
धमनियों में
अविरल गतिमान है
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
सफर के इस पड़ाव में
कितने हमसफर हमसे रूठे
उनकी हर बातें हमसे रूठी
उनका क्रोध, उनका प्यार
हमे मिला
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
जो मेरा था वो उनका था
उनकी सीख जो आज हमारी है
उन सभी का आशीर्वाद
जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया
उनकी मेहनत
जिसने ये दिन दिखाया
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
वाकई उनके बिना ये
सफर अधूरा था
अपूर्व था
आज इस मंजिल तक जिसने
पहुंचाया उन सभी हमसफर को मेरा
धन्यवाद !



बड़े पापा

बड़े पापा के जाने के बाद भी
मैं सुन सकता हूँ उनकी खाँसती आवाज
और उस आवाज के साथ
रेल की  आवाज भी
वह मरफ़ी का ट्रांजिस्टर
आलमारी मे लगा हुआ और
उनका उसपर आकाशवाणी का समाचार
बाहर आँगन मे लगे पौधे
पीछे उगी कुछ सब्जियाँ, पपीते के पेड़
अमरूद मे पानी लगाने की चिंता
सुबह सुबह अखबार का आना
और चाय के साथ उसका बांचना
और कभी कभी  .... हमारा
इम्तहान ....
जिंदगी के शाम को सुबह का इंतजार
वो रात को दूध का ग्लास
दावा का डिब्बा
वह सुबह .... वह आँगन ...
अमरूद का पेड़
नींबू का पौधा, तुलसा का पेड़
वह भूरा, वह कल्लू ...
जैसे जूठन पर अधिकार जामाता  कुत्ता
जिसकी आँखों मे हिंसा कम प्यार ज्यादा
बैठा रहता था बाहर वाले
दरवाजे पर ... चौकन्ना
अब तो बड़े पापा की स्मृतियाँ ही शेष रह गई
बरामदे मे रखा शीशम का तख़्ता
कमरे मे रखा वो पुराना पलंग
दिमाग मे अभी भी सहेज कर रखा है
उनकी कुर्सी, उनकी तकिया
अभी भी है सहेजा रखा दिमाग के पटल पर
हाँ एक तोता भी था
वो तोता भी उड़ गया कहीं
वह पिंजड़ा भी खाली है ....
यह स्मृति है .... स्मृति का क्या
अब तो स्मृति ही शेष बची है
चलो अब यहाँ से ....
कल अपनी भी बारी होगी
कुछ ऐसी ही तैयारी होगी.....

पित्र पक्ष पर बड़े पापा को मेरा चरण स्पर्श ... 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ऐ मौला

जीवन कठिनाईयों मे 
गुजर रहा है ऐ मौला 
रात गुजर रही है 
बगैर नींद के ऐ मौला 
बेपरवाह एक जुगनू 
खलल डाल रहा ऐ मौला 
सफर मे चला जा रहा हूँ 
मंजिल की तलाश मे ऐ मौला
कहता बहुत हूँ, चीखता बहुत हूँ 
सुनता कोई नहीं ऐ मौला 
काली रात कटेगी, सुबह तो होगी 
इंतजार मे हूँ ऐ मौला 
जख्म इतना दिया कि 
इंतहा कि हद कर दी 
जख्म के दर्द का अहसास न रहा ऐ मौला
खारा हो गया हूँ जैसे समंदर का पानी 
अब मिठास की आस है ऐ मौला 
हमनवा, हमनवा न रहा 
हमसफर, हमसफर नहीं 
परछाई भी कतरा रही अब तो मौला .... 

सोमवार, 28 जुलाई 2014

बैठक .....

याद आता है 
वो अपना दो कमरे का घर 
जो दिन मे 
पहला वाला कमरा 
बन जाता था 
बैठक .... 
बड़े करीने से लगा होता था 
तख़्ता, लकड़ी वाली कुर्सी 
और टूटे हुये स्टूल पर रखा 
होता था उषा का पंखा
आलमारी मे होता था 
बड़ा सा मरफ़ी का 
रेडियो ... 
वही हमारे लिए टी0वी0 था 
सी0डी0 था और था होम थियेटर 
कूदते फुदकते हुये 
कभी कुर्सी पर बैठना 
कभी तख्ते पर चढ़ना 
पापा की गोद मे मचलना ...
मेहमानों का लगातार आना 
और मम्मी का लगातार 
चाय बनाना .... 
बहनों द्वारा बनाई गई 
पेंटिंग जो 
बैठक की शान हुआ करती थी 
सारे दिन कोई न कोई तारीफ 
करता ही रहता था 
चाहे वो  "आयुब चाची" हों 
या "सुलेमान" मास्टर 
समय बीता.... 
सपने कुछ बढ़े 
बैठक को सँवारने 
मे हम सभी कुछ न कुछ करते ही रहते थे 
मम्मी की पुरानी साड़ियों 
से बनाए परदे 
इसी का नतीजा थी 
और इस तरह सजने और सँवरने  लगी हमारी प्यारी 
बैठक ... 
सुंदर बैठक के सपने 
बनते और पनपते रहे 
उन सपनों के जंजाल 
को लिए न जाने कितने वर्ष 
यूं ही  बीत गए......  
समय के साथ फंगशुयी, वास्तु की 
बारीकियाँ भी पढ़ता रहा गुनता रहा 
सजाता रहा अपनी 
बैठक ..... 
अब वो लकड़ी वाली कुर्सी 
की जगह कलात्मक गद्देदार 
सोफ़े हैं ...
सुंदर सी मेज है ... 
वास्तु के अनुसार 
मछ्ली का इक्वेरियम भी लगा है 
और तो और 
मम्मी पापा की सुंदर फोटो 
भी बैठक में घुसते सामने नहीं 
लगा सका ... 
वास्तु के दोष के कारण 
वो भी एक तरफ दीवाल पर चिपकी हुयी है 
जो लगातार यह सब देख रही है 
बहुत दुःख होता है 
जिसने हमे इस काबिल करा 
उनकी फोटो भी सामने नहीं 
लगा सका ..... 
बैठक को बहुत ही 
नज़ाकत से रखा है 
चमचमाता हुआ सफ़ेद फर्श है 
बहुत करीने से सफाई दोनों टाईम 
होती है .... 
तमाम चीजें बड़ी नफासत से 
रखी हुयी है ... 
पर नहीं आता है अब ... 
कोई मेहमान 
समय की कमी के 
कारण .... 
कोई आता भी है 
तो बहुत जल्दी में 
दरवाजे से ही लौटा दिया जाता है 
खड़े - खड़े ... 
विदा कर दिया जाता है ....
महल जैसी बैठक में 
बैठने -उठने के 
नियम तय किए गए हैं 
हर किसी को 
थोड़े ही बैठाया जाता है 
बैठक में 
उन गद्देदार सोफ़ों पर 
इसलिए .... 
न सजते हैं काजू 
अब प्लेटों में 
न ट्रे मे चाय सजती है 
और बैठक हमारी बंद ही रहती है 
मिट्टी के डर से 
कहीं गंदी न हो जाये 
बैठक ..... 
                                                                                


शनिवार, 25 अप्रैल 2009

कोई रिश्ता नही है .....

फ़िर वही शाम घिर आयी है
आज फ़िर उसकी याद चली आयी है
दफ़न कर दो यादों के इन लम्हों को
दिल रूककर फ़िर चलने को है
वक्त रुकता नही दिखर यह
उसकी आदत भी हवाओं सी है
हमारा कोई रिश्ता नही रहा फ़िर भी
वह है हमर जिसका उसे पता भी नही है ।