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शनिवार, 18 जुलाई 2020

प्रतीक्षा ..

हाँ ये होता है ... 
मुश्किल की घडी जल्दी नहीं जाती है 
यादें हमेशा से और आती हैं .. 
कितने बार ऐसा होता है 
आदमी टूट जाता है
बिखर जाता है 
मगर वो  नहीं आता है  
प्रतीक्षा हाँ ये प्रतीक्षा बहुत डराती है 
किसी के आने की आस 
उसका अहसास 
क्या गलत क्या सही 
न जाने कितने सवालात कौंध 
जाती है 
प्रतीक्षा हाँ ये प्रतीक्षा बहुत डराती है 
न जाने बारम्बार किसी आहट पर 
नजरें कौंध जाती है 
धड़कने बढ़ जाती है 
कई अतार्किक सवाल 
अपने से आप करने लगता है 
जिसका कोई सर-पैर नहीं होता है 
कभी अपने को झुठलाता है 
कभी उसको झुठलाता है 
मगर यथार्थ वहीँ होता है 
निश्छल, अमिट और अडिग 
मन कहाँ मानता है 
कितने हीं नोटिफिकेशन को 
बार बार देखता हैं 
यह अहसास होता है 
कि  अबकी बार हाँ अबकी बार 
वो आया है ... 
मगर ऐसा नहीं होता है 
दरवाजा हमेशा से ही खुला है 
उसकी आस में 
उसकी अहसास में 
आँखे पथरा गयीं हैं 
दिल बैठ गया है 
मगर जिसका इंतजार है 
वह नहीं आया है 
प्रतीक्षा हाँ ये प्रतीक्षा बहुत डराती है 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

कितने बार

जाने कितने बार मुझे तुमने इस धरती पर जन्म दिया 
जाने कितने बार मुझे तुमने ये स्वरुप  दिया 
जाने कितने बार मुझे इस नाव पर चढ़ा दिया 
जाने  कितने बार मुझे इस भवसागर से पार किया 
जाने कितने बार मुझे इस मृत्यु ने आलंगन किया 
जाने  कितने बार मैंने इस मृत्यु का वरन किया 
अब थक गया हूँ मैं प्रभु इस भवसागर की धार में 
अब बस करो हे  प्रभु इस भवसागर की जंजाल से .... 

यादें

कुछ भूली -बिसरी यादें हैं 
कुछ ताज़ी तरीन बातें हैं 
कुछ यादें मीठी मीठी हैं 
कुछ करेले सी कडवी हैं 
कुछ को भूलना चाहा  में 
कुछ यादों को में भूल गया 
कुछ को भुला कर भुला दिया 
कुछ यादों को मिटा दिया 
कुछ यादें पल दो पल की थीं 
कुछ यादें चिपक कर बैठी हैं 
में हरपल यादों में रहता हूँ 
यादों को ही में जीता हूँ 
कुछ यादें अपनी अपनों की हैं 
कुछ यादें औरों की जैसी हैं 
यादें तो यादें है ... यादों का क्या...... 

गुरुवार, 25 जून 2015

गर्मी बहुत है ....

सुनो, 
गर्मी बहुत है 
अपने अहसासों की हवा 
को जरा और बहने दो 
यादों के पसीनों को 
और सूखने दो 
सुनो, 
गर्मी बहुत है 
गुलमोहर के फूलों 
से सड़कें पटी पड़ी हैं 
ये लाल रंग 
फूल का 
सूरज का 
अच्छा लगता है 
अपने प्यार की बरसात को 
बरसने दो 
बहुत प्यासी है धरती 
बहुत प्यासा है मन 
भीग जाने दो 
डूब जाने दो 
सुनो,
गर्मी बहुत है .... 

मंगलवार, 23 जून 2015

खेल और उसका खेला ...

 शाम हो रही है 
सूरज का तेज अब 
मध्यम होता जा रहा है 
शाम और खेल 
का बड़ा अनूठा 
सायोंग है 
अब बस याद ही है 
खेल और उसका खेला की 
एक खेल था 
ऊंच-नीच 
समान्यतः यह खेल घर
के आँगन मे ही 
खेलते थे, चबूतरे पर 
नाली की पगडंडियों पर 
हम सब ऊपर रहते थे 
और चोर नीचे 
हमे अपनी जगह बदलनी होती थी
और चोर को हमे छूना होता था 
अगर छु लिया तो 
चोर हमे बनना होता था 
बड़ा मजा था 
कई बार तो हम जान बूझकर 
चोर बन जाया करते थे 
मज़े के लिए 
आखिर खेल ही तो था 
आज भी ऊंच-नीच का खेल 
खेल रहे हैं हम सब
वो ऊंच हैं वे नीच हैं 
मगर आँगन मे नहीं 
मन मे 
खेल तो खेल है 
और उसका अपना मज़ा है ... 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

याद मे

हम छोटे छोटे थे 
जब माँ 
कोयले की राख़ से 
गोले बनाती थी 
हम भी बैठे बैठे 
गोले बनाते थे 
ये वाला मेरा 
ये वाला तेरा 
मेरा गोला ज्यादा मोटा 
तेरा वाला पतला गोला 
धूप मे गोले 
फैला दिये जाते 
सूरज अपनी तपन से 
हवा अपने वेग से 
गोले को सूखा देते 
शाम को अम्मा 
उन्हे उठाती 
तब भी हम लड़ते 
ये तेरा वाला 
ये मेरा वाला 
अंगीठी मे एक एक करके 
गोले जलाये जाते 
ये तेरा वाला गया 
ये मेरा वाला गया 
आज जब माँ नहीं है 
गोला नहीं है 
अंगीठी भी नहीं है 
तेरा वाला नहीं है 
मेरा वाला नहीं है 
बस दहक रहा हूँ  आग मे 
खाक होने की आस मे 

रविवार, 21 दिसंबर 2014

फ़ासलों के बावजूद

ईतनी घुटन क्यूँ हैं ... 
घर मे खिड़कियों के बावजूद 
जिंदगी उदास क्यूँ हैं 
खुशियों के बावजूद 
हमें बांटने वालों तुम्हें मालूम हों 
आकाश कायम रहेगा 
दीवारों के बावजूद 
हमने उसका दामन तक 
छुआ नहीं था कभी 
वो मेरे सबसे निकट था 
फ़ासलों के बावजूद ... 

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

जद्दोजहद

हर रोज दुआएं मांगता हूँ रब से ....
घोसला टूट जाता है हवाओं से ...
जब होना है जो मुकद्दर में है
तो दिमाग की कलम हांथ मे क्यूँ हैं
कैसे कहूँ, ये तो होना ही है
4 के बाद 5  तो आना ही है
किस कदर गुजारी है ये तमाम उम्र
बरगद की जटाएँ खुद बयां करती हैं
हर रोज बस एक ही दुआ होती है
शाम होती है सुबह वही दुआ होती है .... 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

हमसफर को मेरा धन्यवाद

जीवन के आपाधापी मे
अच्छा और अच्छा होने की ललक मे
“अम्मू” से “आमोद” बनने
के सफर मे
जो भी मिला उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
साथ साथ चलते हुये
न जाने कितने स्नेह
कितने आत्मीयजन मिले
जिनका प्रतिबिंब आँखों मे
मेरी साँसों मे, खून मे
धमनियों में
अविरल गतिमान है
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
सफर के इस पड़ाव में
कितने हमसफर हमसे रूठे
उनकी हर बातें हमसे रूठी
उनका क्रोध, उनका प्यार
हमे मिला
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
जो मेरा था वो उनका था
उनकी सीख जो आज हमारी है
उन सभी का आशीर्वाद
जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया
उनकी मेहनत
जिसने ये दिन दिखाया
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
वाकई उनके बिना ये
सफर अधूरा था
अपूर्व था
आज इस मंजिल तक जिसने
पहुंचाया उन सभी हमसफर को मेरा
धन्यवाद !


शनिवार, 9 अगस्त 2014

कल तो कल है ....

आज बुरा है !!!
तो क्या हुआ ...
कल अच्छा होगा …
बहुत सुना है
बहुत गुना है
कल जरूर अच्छा होगा
और हम भागते रहे
उसी कल की  ओर
उसी अच्छे की ओर
रोज सपने देखते रहे
सँजोते रहे
बुनते रहे, गुनते रहे ...
उस अच्छे के लिए
एक एक दिन गुजरता रहा
हम इत्ते से उत्ते भी हो गए
और कल हमेशा
कल ही रहा ....
दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल …
और आज को हम
कभी भी जी न सके
इस कल के भंवर मे
उस स्वप्न के सफर मे …
उम्र के इस पड़ाव मे
जल कल कुछ नहीं है ...
तो आज को देखता हूँ
तो आज मे भी कुछ नहीं पाता हूँ
बहुत थक गया हूँ
इस कल के चक्कर मे
आज ही मे जीवन है …
कल का क्या ...
कल तो कल ही है ....
आए न आए ...







रविवार, 3 अगस्त 2014

मनन ...

डरी, सहमी सी लगती है
अंदर जो आवाज है
जिसे अन्तरात्मा कहते हैं
वो चुप है
इस निःशब्द वातावरण मे
वह चीख बनके
निकलेंगे कब ?
जिंदगी, आखिर ....
शुरू होगी कब ?
खुले मन से हँसी
आएगी कब ?
कब खिलखिलाकर
सच सच कहूँ तो
दाँत निपोर कर
आखिर हँसेंगे कब ?
बरसों से इस जाल मे बंधी
उसी राह पर चलते – चलते
आखिर हम बदलेंगे कब ?
थोड़ी आस,
थोड़ा विश्वास
धीरे धीरे पिघलता मन
आखिर कितना बचेगा ?
डर है मुझे ...
इस मुखौटे को पहनकर
दिखावा कर के
मेरा धीरज न टूट जाए
स्वयं ही स्वयं के
सृजन को आखिर
बचाऊँ मे क्यूँ ?
कल आखिर बस
इस जहां में एक
किस्सा रह जाऊंगा ...
इतिहास बन जाऊंगा ...
अपने ही अक्स में
अपनी को ही मार डालूँगा
आखिर क्यूँ ?....

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

अंतिम दर्शन

वो गंगा की धारा 
वो निर्मल किनारा 
जहाँ माँ थी लेटी
हमें कुछ न कहती 
हमें याद है वो 
निर्मल सा चेहरा 
अभी कुछ था कहना 
अभी कुछ था सुनना 
याद आ रहा था 
माँ का तराना 
जिसे गाया करती थी 
माता हमारी ... 
उठाया करती 
वो गाकर तराना 
मगर आज वो लेटी 
हमे कुछ न कहती 
पानी था निर्मल 
वो अश्रु की धारा 
रोके न रुकी थी 
वो आँखों की धारा 
वही था वो सूरज 
वही था किनारा 
मैंने माँ को देखा 
जैसे वो हंसी थी
मगर वो थी लेटी 
हमें कुछ न कहती 
खत्म हो रहा था 
वो सूरज का तेवर
वो चिता का जलाना 
वो दिल का पिघलना 
जहाँ माँ थी लेटी 
बचा कुछ नहीं था 
वही था किनारा 
वही थी वो धारा 
बची बस वो यादें 
माँ की पुरानी 
जिसे लेकर बैठा 
मैं अब भी किनारे .... 
मेरी माँ बसी है 
मेरे मन के अंदर .... 
मुझे याद  आ रहा था 
माँ का वो तराना .... 
उठ जाग मुसाफिर भोर भयी ...... 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

लिखा जाए...

किताबों मे रखे उस मोर के पंख पे लिखा जाए
मेरा दिल कहता है कि एक अच्छी सी लाईन लिखी जाए
इस बेपरवाह भीड़ मे न शौक है न सलीका
गजल किस के लिए, किसके लिए कविता लिखी जाए
वो पेड़, वो मोहब्बत, वो पर्वत छोड़कर आओ
किताबों मे दबे उस एक फूल पर लिखा जाए
बहुत इंकलाब करके मैं तन्हा हूँ  इस जमाने मे
किसे अपना और किसे पराया लिखा जाए
बदलते दौर के नेताओं का जिक्र क्या करना
अब नई राजनीति पे लिखा जाए ...
ज़िंदगानी मे बहुत फंस गए हम  यारों
दांतों मे फंसे उस तिनके पर अफसाना लिखा जाए ... 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

बदलता मौसम

लो .... 
ये क्या मौसम बदलते ही 
तुमने रिश्तों का स्वेटर 
खोल दिया ... 
एक एक फंदे 
जो तुमने चढ़ाये थे 
इतने जतन से 
अचानक ही 
उन्हे उतार दिया .... 
इतने जल्दी तुम 
भी बदल गए 
इस मौसम की तरह 
चलो .... 
ऐसा करना 
मेरी यादों की सलाईयों को 
सहेज कर रख लेना 
फिर कभी ठंड आएगी 
और उस सलाईयों 
पर अहसासों के ऊन से 
फिर रिश्तों का स्वेटर 
बना लेना ... 
किसी अपने के लिए
रिश्तों के लिए 
नातों के लिए.... 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

जब रोज मरा करते थे ...

बातें खत्म हो गई जिसका 
जिक्र हम किया करते थे ...
वो गलियाँ कहीं 
खो गईं जिनपे हम 
चला करते थे ... 
न शाम रही न धुआँ 
किसी एक भी 
चराग में... 
वो चले गए जिन्हे
हम देखा करते थे... 
हमको क्या हक़ है
अब, किसी को कुछ कहने का ,,, 
रास्ता वो सब छूट गए 
जिनपे हम मिला करते थे ... 
अब हमको क्या मारेगी 
क्या, ये दुनियाँ की विरनिया 
वो अंदाज और था जीने का 
जब रोज मरा करते थे ... 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

उलझन ... उलझन है ...

आज गहरे अंतस में
न जाने कैसी 
अजीब सी 
छाया बन रही है 
लगातार जारी है 
समझने की नाकाम कोशिश .... 
मगर छाया नहीं सुलझती 
दौड़ रहा हूँ ... 
बीते हुये कल के 
हर एक के जानिब को 
शायद वो हो ... 
नहीं वो नहीं है ... 
अच्छा वो हो सकता है 
मगर कहाँ भागूँ 
कितना भागूँ ... 
बहुत दूर आ  चुका हूँ 
वापस जाना मुमकीन नहीं हैं 
अंतस में 
छाया और गहरी 
होती जा रही है 
अजीब सा लगता है 
जब कोई अपना हो 
और अपना न भी हो 
छाया तो छाया ही है 
मगर है तो किसी
अपने की 
है न .... 
लगाव सा हो गया है 
मगर पहचान नहीं पा रहा 
कोई - कोई उलझन अच्छी 
लगती है ... 
सुलझे बगैर ... 
उलझन ... उलझन ही है ....