बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

भूल





धुएं में घुट सा जाता हूँ..

फिर भी जिये जाता हूँ..

कहने को चाँद हैं, तारे हैं ..

बेकार आधारों पर जिये जाता हूँ..

सामाजिक बंधनों के नागफनी के कांटे हैं..

उतने ही चूभ जाते हैं जितना निकालता हूँ..

मिथ्या आश्वासन है ..

फिर भी विश्वास किये जाता हूँ..

हवा नहीं है फिजाओं में ...

फिर भी सांस लिए जाता हूँ..

उसकी आस में जिये जाता हूँ..

यही इक भूल किये जाता हूँ..







मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

pate ki baat..

अगर में असत्य कहता हूँ, झूठ कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसा जो झूठ   मे बोल रहा हूँ वो झूठ ही होगा ! असत्य और झूठ का भी अपना एक अस्तित्व है और होता ही है... जब हम ये कहते हैं कि स्वप्न झूठ है, तो उसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि स्वप्न का अस्तित्व नहीं है...! उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि स्वप्न का अस्तित्व मानसिक है, वास्तविक नहीं है, और जब हम कहते हैं कि जगत माया है, तो उसका मतलब यह नहीं होता कि जगत नहीं नहीं है.. क्यूंकि अगर नहीं है तो किससे कह रहे हैं ? कौन कह रहा है ? किसलिए कह रहा है ?




एक आदमी रात को कहीं जा रहा था, रस्ते में एक रस्सी पड़ी थी और वह सांप समझ कर डर कर भाग खड़ा हुआ, अगर उससे ये कहा जाये कि अरे पगले सांप असत्य था झूठ था ... तुम व्यर्थ भाग रहे हो, तब इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सांप झूठ था और इसका यह भी मतलब नहीं है कि उसे सांप दिखाए नहीं दिया, अगर उसे दिखाई नहीं देता तो वो भागते नहीं, कम से कम उसे तो दिखाए दिया सांप ! और जहाँ तक सांप के दिखाई देने का सवाल है तो उस आदमी के लिए वहां सांप था ! और अगर अब उसे आप कहो कि तू आकर देख यहाँ कोई सांप नहीं ये तो केवल रस्सी है तो वो बिलकुल नहीं आएगा क्यूंकि उसने अपनी आँखों से सांप देखा है... अगर आप ज्यादा कहोगे तो वो ये कहेगा कि एक लाठी दे दो तब आऊंगा अगर मुझे सांप दिखा तो में मार दूंगा.. तब आऊंगा.. मगर आपको ये पता है कि लाठी का कोई फायदा नहीं है ये तो रस्सी है.. मगर आप उसे लाठी दोगे.. और फिर उसकी हिम्मत होगी.. और आप भी ये मान गए कि वहां सांप था.. नहीं तो उसे लाठी क्यूँ देते ..!



में एक अँधेरे कमरे में दस कदम अन्दर कि और चला जाऊं और अब मुझे इस अँधेरे कमरे से बाहर आना है तो मुझे कम से कम दस कदम और चलना पड़ेगा.. और मुझे कोई कहे कि अगर आपको इस अँधेरे कमरे से बाहर आना है तो दस कदम और चलिए .. तो में कहूँगा अरे पागल में इस दस कदम चलने के कारण ही अन्दर हूँ और तू मुझे दस कदम और चलने को कह रहा है.. अरे में तो और अँधेरे में चला जाऊंगा.. अरे तू तो मुहे फसा रहा है .. ... अरे मुझे तो ऐसी तरकीब बता जिससे में बाहर आ सकूँ, निकल जाऊं .... ! लेकिन मुझे कम से कम दस कदम तो चलना ही पड़ेगा.. बस चलने का रुख अलग करना पड़ेगा, दिशा अलग करनी होगी, चेहरा बदल गया होगा, जहाँ पीठ थी वहां मुहं होगा और जहाँ मुहं था वहां पीठ होगी... और केवल दस कदम चल कर में अँधेरे कमरे से बाहर निकल जाऊंगा...!



हमें जो दिखाई पड रहा है जीवन में वह जीवन का सत्य नहीं है, पूरी तरह जागकर देखा जाये तभी सब दिखाई पड़ेगा.. !



हम झूठ में जी रहे हैं, लेकिन जितना हम झूठ में उतर गए हैं, उतना ही हमें वापस लौटना होगा.. और सच कहता हूँ जिस दिन हम वापस लौटेंगे उस दिन हम पाएंगे कि बड़े मजे की बात हो गयी है.. !

इंतजार...

तहे जिंदगी दर्द सहता रहा हूँ मैं..

किसी की याद में दम भरता रहा हूँ में..

ये मेरी जिंदगी है या दर्दे दिल की दास्ताँ ..

जो उसके लिए तिल-तिल जलता रहा हूँ में ...

न सोचा, न समझा हमने...

खुद को अपने हांथो मिटा रहा हूँ में..

इंतजार में हूँ बहुत लम्बे सफ़र का ..

किसी के आने का इंतजार कर रहा हूँ में..

मेरी जिंदगी उसके करीब ही होगी..

जिसको ख्वाबों में बना रहा हूँ में..

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

तनाव

तनाव की लिखावटें अक्सर अजीब होती हैं
कांपती हुयी सी और कुछ उलझी हुयी
उनमें कहीं कहीं शब्द टूट जाते हैं
कटिंग होती है और सहायक क्रिया नहीं होती है
सबसे अजीब होता है सपनों का मरना
एक दोस्त बात को बदल कर कहता है
खतरनाक है सपनो का बिखर जाना
दुसरा दोस्त बात को फिर बदलता है कहता है
सबसे अधिक खतरनाक है सपनों का बिक जाना
वह सब कुछ बेच सकता है..।अपनी जमीर... अपना जहाँ
यहाँ तक कि अपना स्वप्न
दिमाग रह रह कर सोचता है
माथे पर सिलवटें बढती जाती हैं
शायद तनाव भारी पड़ता है॥ जिंदगी यूँ हीं गुजरती है
तनाव में... रह जाता है सिर्फ तनाव, तनाव, तनाव...





गुरुवार, 11 अगस्त 2011

यादें

बातें ख़त्म हो गयीं जिक्र जिसका हम किया करते थे .......
वो गलियां कहीं खो गयीं जिन पर हम चला करते थे......
न शाम रही न धुआं किसी एक भी चिराग मैं......
वो चले गए जिन्हें हम देखे कभी न थकते थे......
हमको क्या हक है अब किसी को कुछ कहने का ......
बातें वो और थीं ॥ हम जिनपे मिला करते थे .....
रास्ता न रहा कोई मेरी मंजिलें तक़दीर का .......
रास्ता वो सब छुट गया॥ हम जिनपे मिला करते थे .....
अब हमको मारेगी क्या दुनियां कि ये विरानियाँ ...
वो अंदाज और था.. जीने का.. जब रोज मरा करते थे..

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

जीवन के रंग

जीवन के आपाधापी मैं ...
सृष्टि के अनुपम चित्र मैं..
उस महान चित्रकार कि..
तुलिका से..
ख़त्म किया जा रहा रंग....

बेस्वाद होते टमाटर
रोज चटखीले नज़र आते हैं..
बैगनी रंग..
और चटकदार होता जा रहा है..
मगर स्वाद ख़त्म हो रहा है.. बैगन से....

अधरों प़र मोहित मुस्कान लिए ...
बाला बैठी है.. चटकदार कपडे पहने..
नेल पोलिश का रंग भी .. अजीब है..
बेच रही है.. खोखली मुस्कान..
और खोता जा रहा है.. रंग.....

जीवन का रंग, ख़ुशी... गम ...
सब एक रंग मैं होता जा रहा ..
सफ़ेद रंग भी.. अब सफ़ेद न रहा...
लाल चोला भी.. अब लाल न रहा..
जीवन का रंग कहीं खोता जा रहा .....

उदासी, ख़ुशी, उल्लास ...
देखनी हो तो ..
चले आओ .. बहुत रंगीन ..
चटकदार माल बने हैं.. आपके शहर मैं..
जिसमे रंग तो हैं.. पर रंग नहीं है..

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

एक शाम




फिर वही शाम घिर आयी है ..






आज फिर उसकी याद चली आयी है..




दफ़न कर दो यादों के इन लम्हों को ...






दिल रूककर फिर चलने को है..






वक्त रुकता नहीं देखकर यह ..





उसकी आदत भी हवाओ सी है...





हमारा कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी ..



वह है हमारा जिसका उसे पता भी नहीं है ..