सोमवार, 9 नवंबर 2015

कितने बार

जाने कितने बार मुझे तुमने इस धरती पर जन्म दिया 
जाने कितने बार मुझे तुमने ये स्वरुप  दिया 
जाने कितने बार मुझे इस नाव पर चढ़ा दिया 
जाने  कितने बार मुझे इस भवसागर से पार किया 
जाने कितने बार मुझे इस मृत्यु ने आलंगन किया 
जाने  कितने बार मैंने इस मृत्यु का वरन किया 
अब थक गया हूँ मैं प्रभु इस भवसागर की धार में 
अब बस करो हे  प्रभु इस भवसागर की जंजाल से .... 

यादें

कुछ भूली -बिसरी यादें हैं 
कुछ ताज़ी तरीन बातें हैं 
कुछ यादें मीठी मीठी हैं 
कुछ करेले सी कडवी हैं 
कुछ को भूलना चाहा  में 
कुछ यादों को में भूल गया 
कुछ को भुला कर भुला दिया 
कुछ यादों को मिटा दिया 
कुछ यादें पल दो पल की थीं 
कुछ यादें चिपक कर बैठी हैं 
में हरपल यादों में रहता हूँ 
यादों को ही में जीता हूँ 
कुछ यादें अपनी अपनों की हैं 
कुछ यादें औरों की जैसी हैं 
यादें तो यादें है ... यादों का क्या...... 

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

.....कल का क्या ...


आज बुरा है !!!
तो क्या हुआ ...
कल अच्छा होगा …
बहुत सुना है
बहुत गुना है
कल जरूर अच्छा होगा
और हम भागते रहे
उसी कल की  ओर
उसी अच्छे की ओर
रोज सपने देखते रहे
सँजोते रहे
बुनते रहे, गुनते रहे ...
उस अच्छे के लिए
एक एक दिन गुजरता रहा
हम इत्ते से उत्ते भी हो गए
और कल हमेशा
कल ही रहा ....
दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल …
और आज को हम
कभी भी जी न सके
इस कल के भंवर मे
उस स्वप्न के सफर मे …
उम्र के इस पड़ाव मे
जल कल कुछ नहीं है ...
तो आज को देखता हूँ
तो आज मे भी कुछ नहीं पाता हूँ
बहुत थक गया हूँ
इस कल के चक्कर मे
आज ही मे जीवन है …
कल का क्या ...
कल तो कल ही है ....

आए न आए ... 

जीवन का सफर .....

  
जीवन के आपाधापी मे
अच्छा और अच्छा होने की ललक मे
“अम्मू” से “आमोद” बनने
के सफर मे
जो भी मिला उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
साथ साथ चलते हुये
न जाने कितने स्नेह
कितने आत्मीयजन मिले
जिनका प्रतिबिंब आँखों मे
मेरी साँसों मे, खून मे
धमनियों में
अविरल गतिमान है
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
सफर के इस पड़ाव में
कितने हमसफर हमसे रूठे
उनकी हर बातें हमसे रूठी
उनका क्रोध, उनका प्यार
हमे मिला
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
जो मेरा था वो उनका था
उनकी सीख जो आज हमारी है
उन सभी का आशीर्वाद
जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया
उनकी मेहनत
जिसने ये दिन दिखाया
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
वाकई उनके बिना ये
सफर अधूरा था
अपूर्व था
आज इस मंजिल तक जिसने
पहुंचाया उन सभी हमसफर को मेरा
धन्यवाद !



बड़े पापा

बड़े पापा के जाने के बाद भी
मैं सुन सकता हूँ उनकी खाँसती आवाज
और उस आवाज के साथ
रेल की  आवाज भी
वह मरफ़ी का ट्रांजिस्टर
आलमारी मे लगा हुआ और
उनका उसपर आकाशवाणी का समाचार
बाहर आँगन मे लगे पौधे
पीछे उगी कुछ सब्जियाँ, पपीते के पेड़
अमरूद मे पानी लगाने की चिंता
सुबह सुबह अखबार का आना
और चाय के साथ उसका बांचना
और कभी कभी  .... हमारा
इम्तहान ....
जिंदगी के शाम को सुबह का इंतजार
वो रात को दूध का ग्लास
दावा का डिब्बा
वह सुबह .... वह आँगन ...
अमरूद का पेड़
नींबू का पौधा, तुलसा का पेड़
वह भूरा, वह कल्लू ...
जैसे जूठन पर अधिकार जामाता  कुत्ता
जिसकी आँखों मे हिंसा कम प्यार ज्यादा
बैठा रहता था बाहर वाले
दरवाजे पर ... चौकन्ना
अब तो बड़े पापा की स्मृतियाँ ही शेष रह गई
बरामदे मे रखा शीशम का तख़्ता
कमरे मे रखा वो पुराना पलंग
दिमाग मे अभी भी सहेज कर रखा है
उनकी कुर्सी, उनकी तकिया
अभी भी है सहेजा रखा दिमाग के पटल पर
हाँ एक तोता भी था
वो तोता भी उड़ गया कहीं
वह पिंजड़ा भी खाली है ....
यह स्मृति है .... स्मृति का क्या
अब तो स्मृति ही शेष बची है
चलो अब यहाँ से ....
कल अपनी भी बारी होगी
कुछ ऐसी ही तैयारी होगी.....

पित्र पक्ष पर बड़े पापा को मेरा चरण स्पर्श ... 

शनिवार, 11 जुलाई 2015

मुट्ठी मे रेत

यूं हीं
सड़क के किनारे 
पुलिया पर बैठे बैठे 
आते जाते लोगों को देखता 
अपनी मगन मे 
मस्त बैठा 
जिंदगी के तमाम 
सवालों पर 
खुद ही मुस्कराता 
कभी इठलाता 
सोचता, तभी 
अचानक 
साइकिल सवार आता दिखा
लिया था कुछ समान 
पीछे था तेल का कनस्तर 
चला जा रहा था 
अपनी मस्ती मे 
आज शाम बच्चों के साथ 
खाएँगे पकोड़ी 
और भी बहुत कुछ 
तभी भाग्य ने पलटा मारा 
हवाओं ने रुख पलटा 
और वो गिर पड़ा 
गिरते ही सारे 
अरमान चूर चूर हो गए 
आलू, टमाटर, प्याज  और आटा
सड़क पर बिखर गए 
वो व्यक्ति उसे बड़ी 
उदासी से देख रहा था 
क्या बटोरे 
कैसे इकठ्ठा करे 
शाम हो चुकी है 
बच्चे इंतजार मे हैं 
आजों वो क्या खिलाएगा ....
ज़िंदगी यूं ही बिखर जाएगी 
उसे मालूम न था 
तेल का कनस्तर 
लुढ़का हुआ था 
तेल बहकर सारा फैला हुआ था 
वो दोनों हाथों से उसे उठाने 
की असफल कोशिश 
मे लगा था 
जिंदगी देखते देखते 
यूं ही सरक रही थी 
शाम हो चुकी थी 
वो पुलिया पर बैठा बैठा 
ये देख रहा था ..... 

जीवन के रंग

जीवन के आपाधापी मे 
सृष्टि के अनुपम चित्र में 
उस महान चित्रकार की 
तूलिका से खत्म होता जा रहा रंग .... 

बेस्वाद होते टमाटर 
रोज चटकीले लाल नज़र आते हैं 
बैगनी रंग और चटकदार होता जा रहा है 
मगर स्वाद खत्म हो रहा 
है बैगन में 

अधरों पर मोहित मुस्कान लिए 
जो बाला बैठी है चटकदार कपड़े पहने 
उसके नेलपॉलिश का भी रंग 
कुछ अजीब है 
बेच रही है खोखली मुस्कान 
और खोता जा रहा है रंग..... 

जीवन का गम, खुशी सब 
एक रंग मे होती जा रही है 
सफ़ेद रंग भी अब सफ़ेद न रहा 
लाल चोला भी अब लाल न रहा 
जीवन का रंग अब खोता जा रहा है ...... 

उदासी, खुशी, उल्लास 
कहीं दिखती हो तो चले आओ 
बहुत रंगीन हैं 
चटकदार माल बने हैं 
जिसमे रंग तो हैं मगर रंग है नहीं ....