मंगलवार, 19 मई 2020
सोमवार, 15 जुलाई 2019
गरीबी क्या होती है ...
स्कूल का चौथा पिरीअड चल रहा था हमारे क्लास रूम
में धुप बड़े आराम से पैर फैला रही थी और हाँ उस समय हमारे पास कोई घडी नहीं होती
थी तो हम लोगों ने धुप के निशान को अपनी घडी बनाए हुये थे, जब धुप यहाँ तक आ जाएगी
तो चौथा पिरिअड ख़त्म हो जाएगा और अगर यहाँ आ जायेगी तो इंटरवल शुरू हो जायेगा और
अगर धुप पिछली दिवार को छु जायेगी तो हुर्रे ...... छुट्टी हो जाएगी !
तो हाँ हमें मालूम हो गया कि बस कुछ मिनटों में टन
टन टन टन टन टन टन घंटी बजेगी और हम लोगों की आधी छुट्टी हो जायेगी, हम लोग आधी
छुटटी का इन्तजार करने लगे ! तभी कानों में टन टन टन टन टन टन टन घंटी की आवाज
सुनायी दी और हम झूम उठे हमारे सभी साथी कैंटीन में जाने के लिए प्लानिंग करने लगे
कि आज कौन पार्टी देगा और में ये सुनकर किनारे खसकने लगा और मैं स्कुल के उस कौने
में पहुँचना चाहता था जहाँ कोई भी न आ सके .... दोस्तों ने मुझसे कहा कि चलो हमारे
साथ चलो मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं आऊंगा मेरे पास पैसा नहीं है और मैं कब तक तुम लोगों के द्वारा दिए
गए सामान को खाऊंगा .... दोस्तों ने तंज मारा कि कम से कम १० रुपये तो जेब खर्च के
लाया करो .....
मैं निरुत्तर चुप चाप वहां से बहुत जल्दी हटने की
कोशिश करने लगा मैं उनको कोई जवाब नहीं देना चाहता था कि मैं जेब खर्च क्यूँ नहीं
ला सकता ? मेरे
दो भाई और एक बहन थी पापा दिन भर मजदूरी करने के बाद जो पैसा लाते हम सभी उसी में
जो हो सकता था खाते थे अम्मा आस पड़ोस के घर में बर्तन मांजती थी तब जाकर कहीं हम
लोगों का पेट किसी तरह से भर पाता था ! कई दिन तो हम केवल रोटी और सरसों का तेल चुपड़
कर नमक लगाकर खाते थे !
हमने गरीबी देखी है जी है और गरीबी से ही उठ कर
आये हैं और हमें 10 रुपये के भी अंदाजा है कि वो कितना मूल्यवान होता है !
बुधवार, 28 फ़रवरी 2018
जोगी रा स र र र र र र र र र र ........
शाम को जब खेल के थक के घर आते थे .... तो अम्मा सबसे पहले "बकुआ" (सरसों और हल्दी की सिल बट्टे पर पीसकर ) रगड़ रगड़ के लगाती थी फिर जो मैल शरीर से निकलता था उसे पुडिया बनाकर देती और कहती की जाओ इसे होलिका में दाल आओ ... हम फिर निकल जाया करते होलिका के हुडदंग में वो पुडिया डालने और ... फिर वही जोगी रा स र र र र र र र र.....
बड़ी मुश्किल से रात गुजारी जाती थी ... और अगले दिन सुबह सुबह ही सबसे पहले अम्मा हमें पुराने कपडे देती और कडवा तेल देती और हम उसे पुरे शरीर पर लगाते जिससे कि रंग न चढ़े ... और वो होली वाली टोपी लगाकर दोस्तों की टोली के साथ निकल पड़ते जोगी रा स र र र र र र .....
क्या मस्ती थी ... उन दिनों की क्या मज़ा था उन दिनों का .... अब कहा होली ... अब तो बस हो...... ली.... न वो गुझिया रही .. न ही बड़े रहे ... न समोसे .. न रसगुल्ले .... अब तो रंग ही नहीं रहे होली में ....
अब कहाँ जोगी रा स र र र र र र र र..... कहने वाले रहे ....
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
गर्मी बहुत है
सुनो,
गर्मी बहुत है
अपने अहसासों की हवा
को जरा और बहने दो
यादों के पसीनों को
और सूखने दो
सुनो,
गर्मी बहुत है
गुलमोहर के फूलों
से सड़कें पटी पड़ी हैं
ये लाल रंग
फूल का
सूरज का
अच्छा लगता है
अपने प्यार की बरसात को
बरसने दो
बहुत प्यासी है धरती
बहुत प्यासा है मन
भीग जाने दो
डूब जाने दो
सुनो,
गर्मी बहुत है ....
गर्मी बहुत है
अपने अहसासों की हवा
को जरा और बहने दो
यादों के पसीनों को
और सूखने दो
सुनो,
गर्मी बहुत है
गुलमोहर के फूलों
से सड़कें पटी पड़ी हैं
ये लाल रंग
फूल का
सूरज का
अच्छा लगता है
अपने प्यार की बरसात को
बरसने दो
बहुत प्यासी है धरती
बहुत प्यासा है मन
भीग जाने दो
डूब जाने दो
सुनो,
गर्मी बहुत है ....
शनिवार, 22 अक्टूबर 2016
सपने ..
कुछ सपने केवल सपने ही रह जाते हैं
बिना पूरे हुये, बिना हकीकत हुये
और हमे वो ही अच्छे लगते हैं
अधूरे सपने, बिना अपने हुये
हम जी लेते हैं
उसी अधूरेपन को
उसी खालीपन को
सपने की चाहत में
जानते हुये भी ....
सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
यथार्थ को छोड़कर
परिस्थिति से मुह मोड़कर
हम जीते हैं सपने में
सपने हम रोज देखते हैं
कुछ ही सपनो को हम जीते हैं
बाकी सपने सपने ही रह जाते हैं
सपने तो सपने हैं ...
वो कहाँ अपने हैं ....
बिना पूरे हुये, बिना हकीकत हुये
और हमे वो ही अच्छे लगते हैं
अधूरे सपने, बिना अपने हुये
हम जी लेते हैं
उसी अधूरेपन को
उसी खालीपन को
सपने की चाहत में
जानते हुये भी ....
सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
यथार्थ को छोड़कर
परिस्थिति से मुह मोड़कर
हम जीते हैं सपने में
सपने हम रोज देखते हैं
कुछ ही सपनो को हम जीते हैं
बाकी सपने सपने ही रह जाते हैं
सपने तो सपने हैं ...
वो कहाँ अपने हैं ....
शुक्रवार, 2 सितंबर 2016
पगडण्डी
रात की चादर ओढ़े
चुपचाप सोयी है
वो पगडण्डी जो शहर से
गाँव की ओर आती है
पगडण्डी पर उगी घासें
नाम हैं, भीगी हैं
जैसे सुबक कर
कोई चुप हो गया हो
बहुत रोई होगी उस
राहगीर के लिए जो लौट के न आया
उसका घर छुटा
वो भीतर से टुटा
सन्नाटा है पसरा
पगडण्डी अभी भी
चुप है सुबक रही है ...... इंतज़ार में ..
चुपचाप सोयी है
वो पगडण्डी जो शहर से
गाँव की ओर आती है
पगडण्डी पर उगी घासें
नाम हैं, भीगी हैं
जैसे सुबक कर
कोई चुप हो गया हो
बहुत रोई होगी उस
राहगीर के लिए जो लौट के न आया
उसका घर छुटा
वो भीतर से टुटा
सन्नाटा है पसरा
पगडण्डी अभी भी
चुप है सुबक रही है ...... इंतज़ार में ..
सोमवार, 13 जून 2016
आत्म विशवास
यूँ ही सिकोड़ कर
आलमारी के एक कोने में कहीं ...
पुराने अखबार सी हो गयी है जिंदगी
तिरस्कारित कल की खबर
जिसको कोई पढता ही नहीं
चिमुड़ गया है हर पेज
चाहो तो भी खोल न पाओ ....
उन्ही सीले हुए पेजों पर
कही कही चमकते इश्तहार भी हैं
जिसका वजूद धरातल पर
कहीं नहीं हैं ....
सोच रहा हूँ क्या फायदा है
बेच दूँ .. इस रद्दी को
किसी कबाड़ वाले को
जिसका कोई भाव न हो
क्या फायदा रखने से भी
जला डालूं , कुछ तपिश ही
महसूस कर लूँ .....
मगर आज भी हर पेज
पर दीखता है वही उम्मीद
जो हर सुबह की ताज़ी खबर
नए अखबार में होती है .....
आलमारी के एक कोने में कहीं ...
पुराने अखबार सी हो गयी है जिंदगी
तिरस्कारित कल की खबर
जिसको कोई पढता ही नहीं
चिमुड़ गया है हर पेज
चाहो तो भी खोल न पाओ ....
उन्ही सीले हुए पेजों पर
कही कही चमकते इश्तहार भी हैं
जिसका वजूद धरातल पर
कहीं नहीं हैं ....
सोच रहा हूँ क्या फायदा है
बेच दूँ .. इस रद्दी को
किसी कबाड़ वाले को
जिसका कोई भाव न हो
क्या फायदा रखने से भी
जला डालूं , कुछ तपिश ही
महसूस कर लूँ .....
मगर आज भी हर पेज
पर दीखता है वही उम्मीद
जो हर सुबह की ताज़ी खबर
नए अखबार में होती है .....
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