शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

गैर जरुरी चीजें..

तमाम गैर जरुरी चीजें..


गुम हो जाते हैं घर से चुपचाप...


हमारी बेखबर नज़रों से...


जैसे मम्मी का मोटा चश्मा..


पापा जी का छोटा रेडियो...


उन दोनों के जाने के बाद..


गुम हो जाता है कहीं...


पुराने जूते, स्याही वाला पेन, पुराना कल्याण (किताब)...


हमारी जिंदगी की अंधी गलियों से...


हर जगह पैर फैलाकर, कब्ज़ा करती जाती हैं...


हमारी जरूरतें, लालसाएं...


आलमारी मैं पीछे खिसकते जाती हैं..


पुरानी डायरी, जीते हुए कप...


मम्मी का भानमती का पिटारा..


सुई धागे वाला डिब्बा...


शायद....


किसी भूले हुए किताब मैं..


सहेज के रखे हों..


गुलाब के फूल, मोर के पंख...


तितली के पर...


या अभी किसी किताबों के ...


बिच रखे हों सुरक्षित ...


मुहर लगे डाक टिकट...


पुराने पत्र...


और पच्चीस पैसे का सिक्का...


इस भीड़ भाड़ के मेले में ..


एक एक करके सभी चीजें ..


पीछे छुटती जाती है....


हमसे...


बचपन के दोस्त, जीती हुयी क्रिकेट की गेंद...


लुटी हुयी पतंगे, चंदामामा(किताब) की किताबें ....


मकानों के कंधे पर सवार ...


टीवी का एंटीना ...


अब नहीं उलझता पतंग उड़ाने में..


और तो और...


अब कोई नहीं देखता चंदामामा को ...


अब नहीं पसरती आँगन में..


अलसाई ठण्ड की धूप ...


धुंधले होते जाते हैं ..


धीरे धीरे ये सारे चटख रंग...


सपनों के रंग बदलते जाते हैं ...


एक एक करके ...


बदलते मौसम के साथ ...


और एक एक करके ..


आँखों की दहलीज से बाहर ..


चले जाते हैं ..


सर झुकाए हुए..


गुजरते मौसम की तरह ....


हम भूल जाते हैं ....


वो लेमनचूस(टॉफी), खट्टी इमली का चटपटा स्वाद ...


हमें घेर कर रखा है टीवी का कर्कश शोर..


और हमारे सकरे जीवन के दरवाजे को ..


बजा कर लौट जाती है ...


न जाने कितनी पूनम की रातें..


सुबह सुबह की भीगी औंस...


लाल घेरे मैं कैद रहती है तारीख...


और बदल जाते है ये कलेंडर..

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

मेरी माँ ....

याद है



सामने वाले सोफे पर...


कुशन लगाये हुए..


सर को टिकाये हुए..


बिना कुछ बोले हुए..


बेमतलबे, बेपरवाह(हमें लगता था )..


बैठी रहती थी..


टीवी देखा करती थी..


अनायास आंखे बंद करके ...


सोया करती थी..


आहट होते ही..


क्या हुआ ?


मै सो कहाँ रही थी..


ऐसा कहा करती थी..






आज..


मैं अकेला ही..


कमरे मैं आकर बैठा हूँ...


सोफा, टीवी, और रिमोट..


मुझे अजीब..


निगाहों से देख रहे हैं..


मुझसे पुछ रहे हैं..


मैं परेशान हूँ..


आवाज देने की कोशिश करता हूँ.. माँ.. माँ ... माँ ...


सोचता हूँ..


आपको बैठे, बैठे....


सोने की आदत थी..


सोफा, टीवी और रिमोट चुप है..


मैं निश्छल बैठा हूँ..


और माँ की यादों मैं खो जाता हूँ...


शनिवार, 19 नवंबर 2011

रंग ...


जीवन की आपाधापी मैं ...


सृष्टि के अनुपम चित्र मैं...


उस महान चित्रकार की..


तुलिका से...


ख़त्म होता जा रहा रंग....


बेस्वाद होते टमाटर..


रोज चटखीले लाल नज़र आते हैं..


बैगनी रंग ...


और चटकदार होता जा रहा...


मगर स्वाद ख़त्म हो रहा है बैंगन से...


अधरों पर मोहित मुस्कान लिए..


बाला बैठी है चटकदार कपडे पहने..


नील पोलिश का रंग भी अजीब है..


बेच रही है खोखली मुस्कान...


और सोता जा रहा रंग...


जीवन का गम, ख़ुशी...


सब एक रंग मैं होता जा रहा है.


सफ़ेद रंग भी अब सफ़ेद न रहा..


लाल चोला अब लाल न रहा..


और जीवन का वास्तविक रंग खोता जा रहा..


उदासी, ख़ुशी, उल्लास..


देखनी है तो....


चले आओ, बहुत रंगीन..


चटकदार माल बने हैं..


जिनमे रंग तो हैं.. पर रंग नहीं है...





शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

"भावना"



जिंदगी का फलसफा...


कुछ कहा कुछ अनकहा...


हंसती, खिलखिलाती अपनी "भावना"....


कुछ नए अंदाज में आवाज देकर करना मामा निमस्ते...


याद आती है अपनी वो "भावना"...


"भावना" अपनी भावना कह न सकी..


हम सब को छोड़ गयी अपनी प्यारी "भावना"...


जिंदगी यूँ ही गुजरी रोज की तरह..


सबेरा हुआ, पंक्षी चहचहाने लगे...


सभी अपने में व्यस्त होने लगे..


मगर न रही अपनी प्यारी "भावना"...


बहुत याद आती है...


हम सब की अपनी प्यारी वों "भावना"....


जिंदगी का फलसफा...


कुछ कहा कुछ अनकहा...


भावना... अपनी प्यारी "भावना"....


शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

बहुत दिनों बाद

आज बहुत पुरानी...


किताब पर अंगुलियाँ चलाईं ..

जाने कहाँ से एक आवाज ..

चली आयी..

आवाज एक भर्राई सी..

कुछ जानी पहचानी..

कुछ बरसों पुरानी..

एक हंसी जो दूर से ...

हंसी जा रही थी..

कितनी बातें अचानक..

उसी आवाज में..

ख्याल में, अंदाज में, आ गयी थी..

दिल में उठा था दर्द बहुत दिनों बाद..

जैसे बच्चा उठा हो सोने के बाद..

पन्नों को कुछ ऐसे टटोल रहा था..

जैसे अंगुलियाँ सहला रही हों..

मेरे फैले हुए बालों को..

मेरी अंगुलिओं को पड़कर ..

ले जाने लगा,

समय किन्ही बिछड़े रास्तों में..

में कुछ सोचकर किताब बंद कर दी..

किन्ही और दिन के लिए..

यादें सहेज कर बंद कर दी. ...

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

खतरा


हर पुराने चोर को खतरा नए चोर से है..


आजकल इस बात की चर्चा बड़े जोरों से है..


मुस्कराहटों से पता चलता नहीं जज्बात का..


मेरा मतलब आँख की उन नाम हुयी कोरों से है..






आदमी से क्यूँ दरोगे आदमी क्या चीज है..


डर अगर कठपुतलियों को है तो वह डोरों से है..






बढ़ गयी हैं नेवलों की और जिम्मेदारियां...


आजकल साँपों की गहरी दोस्ती मोरों से है..






हम क्यूँ साथी बनाये आज तूफानों को..


एक मुद्दत से हमारा साथ कमजोरों से है..




शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

एक शाम

शाम जब आती है ..


दिवाकर वक़्त के परों पर बैठकर..

धीर धीरे चला जाता है ...

और उस लालिमा के साथ..

ये दिल भी डूबने लगता है...

शाम के आने कि सूचना ...

देते पंक्षी जब लौटते हैं बसेरों को..

दरख्तों के लम्बे होते साये....

पड़ते हैं जमीनों पर....

तो अचानक ही तुम्हारी ..

याद आ जाती है..

और व्यतीत होता एक दिन ....

समाप्त हो जाता है..

और एक आशा आंसूं बनकर..

आँखों में मुस्कराने लगती है..

जब शाम आती है..