शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

मेरी माँ ....

याद है



सामने वाले सोफे पर...


कुशन लगाये हुए..


सर को टिकाये हुए..


बिना कुछ बोले हुए..


बेमतलबे, बेपरवाह(हमें लगता था )..


बैठी रहती थी..


टीवी देखा करती थी..


अनायास आंखे बंद करके ...


सोया करती थी..


आहट होते ही..


क्या हुआ ?


मै सो कहाँ रही थी..


ऐसा कहा करती थी..






आज..


मैं अकेला ही..


कमरे मैं आकर बैठा हूँ...


सोफा, टीवी, और रिमोट..


मुझे अजीब..


निगाहों से देख रहे हैं..


मुझसे पुछ रहे हैं..


मैं परेशान हूँ..


आवाज देने की कोशिश करता हूँ.. माँ.. माँ ... माँ ...


सोचता हूँ..


आपको बैठे, बैठे....


सोने की आदत थी..


सोफा, टीवी और रिमोट चुप है..


मैं निश्छल बैठा हूँ..


और माँ की यादों मैं खो जाता हूँ...


2 टिप्‍पणियां:

  1. तभी तो माँ माँ होती है उसके जैसा कोई हो ही नहीं सकता ..
    ..माँ की याद में डूबी मार्मिक प्रस्तुति पढ़कर ऑंखें भर आई

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  2. एकदम सच कहा आपने.. माँ तो आखिर माँ ही होती है.. आपका बहुत बहुत आभार.....

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