गुरुवार, 6 जून 2013

आजकल.....


हर पुराने चोर को खतरा नए चोर से है..
आजकल इस बात की चर्चा बड़े जोरों से है..

मुस्कराहटों से पता चलता नहीं जज्बात का..
मेरा मतलब आँख की उन नम हुयी कोरों से है..

आदमी से क्यूँ डरोगे  आदमी क्या चीज है..
डर अगर कठपुतलियों को है तो वह डोरों से है..

बढ़ गयी हैं नेवलों की और जिम्मेदारियां...
आजकल साँपों की गहरी दोस्ती मोरों से है..

हम क्यूँ साथी बनाये आज तूफानों को..
एक मुद्दत से हमारा साथ कमजोरों से है..

7 टिप्‍पणियां:

  1. आमोद जी,
    आपकी यह कविता गैर वाणिज्यिक रूप से प्रयोग में लाने की अनुमति चाहता हूं। अग्रिम अनुमति की आशा से "दक्षिण भारत राष्ट्रमत' के 8 जून अंक में संपादकीय पृष्ठ पर इसे प्रकाशित करने जा रहा हूं। आशा है आप अन्यथा न लेंगे। कृपया देखें दक्षिण भारत ई-पेपर के 8 जून का अंक....
    राजकुमार भट्टाचार्य
    दक्षिण भारत

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    1. आदरणीय राजकुमार जी .. आपका बहुत बहुत आभार .. मुझे कोई आपत्ति नहीं हैं .. बस में इतना चाहता हूँ कि उस पत्रिका का लिंक मुझे दे सके तो अच्छा होता .... धन्यवाद् ...

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  2. अनकहे जज़्बातों को ब्यान करती प्रभावशाली रचना...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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    1. सुश्री पल्लवी जी.. आपका बहुत बहुत आभार.. अवश्य में आपके ब्लॉग पर आऊंगा..

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  4. आदरणीय वंदना जी आपका बहुत बहुत आभार.. चर्चा मंच पे शामिल करने के लिए..

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