शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

सपने ..

कुछ सपने केवल सपने ही रह जाते हैं 
बिना पूरे हुये, बिना हकीकत हुये 
और हमे वो ही अच्छे लगते हैं 
अधूरे सपने, बिना अपने हुये 
हम जी लेते हैं 
उसी अधूरेपन को
उसी खालीपन को
सपने की चाहत में
जानते हुये भी ....
सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
यथार्थ को छोड़कर
परिस्थिति से मुह मोड़कर
हम जीते हैं सपने में
सपने हम रोज देखते हैं
कुछ ही सपनो को हम जीते हैं
बाकी सपने सपने ही रह जाते हैं
सपने तो सपने हैं ...
वो कहाँ अपने हैं ....

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

पगडण्डी

रात की चादर ओढ़े
चुपचाप सोयी है
वो पगडण्डी जो शहर से
गाँव की ओर आती है
पगडण्डी पर उगी घासें
नाम हैं, भीगी हैं
जैसे सुबक कर
कोई चुप हो गया हो
बहुत रोई होगी उस
राहगीर के लिए जो लौट के न आया
उसका घर छुटा
वो भीतर से टुटा
सन्नाटा है पसरा
पगडण्डी अभी भी
चुप है सुबक रही है ...... इंतज़ार में ..

सोमवार, 13 जून 2016

आत्म विशवास

यूँ ही सिकोड़ कर 
आलमारी के एक कोने में कहीं ... 
पुराने अखबार सी हो गयी है जिंदगी 
तिरस्कारित कल की खबर 
जिसको कोई पढता ही नहीं 
चिमुड़  गया है हर पेज 
चाहो तो भी खोल न पाओ .... 
उन्ही सीले हुए पेजों पर 
कही कही चमकते इश्तहार भी हैं 
जिसका वजूद धरातल पर 
कहीं नहीं हैं .... 
सोच रहा हूँ क्या फायदा है 
बेच दूँ .. इस रद्दी को 
किसी कबाड़  वाले को 
जिसका कोई भाव न हो 
क्या फायदा रखने से भी 
जला डालूं , कुछ तपिश ही 
महसूस कर लूँ ..... 
मगर आज भी हर पेज 
पर दीखता है वही उम्मीद 
जो हर सुबह की ताज़ी खबर 
नए अखबार में होती है ..... 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

कितने बार

जाने कितने बार मुझे तुमने इस धरती पर जन्म दिया 
जाने कितने बार मुझे तुमने ये स्वरुप  दिया 
जाने कितने बार मुझे इस नाव पर चढ़ा दिया 
जाने  कितने बार मुझे इस भवसागर से पार किया 
जाने कितने बार मुझे इस मृत्यु ने आलंगन किया 
जाने  कितने बार मैंने इस मृत्यु का वरन किया 
अब थक गया हूँ मैं प्रभु इस भवसागर की धार में 
अब बस करो हे  प्रभु इस भवसागर की जंजाल से .... 

यादें

कुछ भूली -बिसरी यादें हैं 
कुछ ताज़ी तरीन बातें हैं 
कुछ यादें मीठी मीठी हैं 
कुछ करेले सी कडवी हैं 
कुछ को भूलना चाहा  में 
कुछ यादों को में भूल गया 
कुछ को भुला कर भुला दिया 
कुछ यादों को मिटा दिया 
कुछ यादें पल दो पल की थीं 
कुछ यादें चिपक कर बैठी हैं 
में हरपल यादों में रहता हूँ 
यादों को ही में जीता हूँ 
कुछ यादें अपनी अपनों की हैं 
कुछ यादें औरों की जैसी हैं 
यादें तो यादें है ... यादों का क्या...... 

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

.....कल का क्या ...


आज बुरा है !!!
तो क्या हुआ ...
कल अच्छा होगा
बहुत सुना है
बहुत गुना है
कल जरूर अच्छा होगा
और हम भागते रहे
उसी कल की  ओर
उसी अच्छे की ओर
रोज सपने देखते रहे
सँजोते रहे
बुनते रहे, गुनते रहे ...
उस अच्छे के लिए
एक एक दिन गुजरता रहा
हम इत्ते से उत्ते भी हो गए
और कल हमेशा
कल ही रहा ....
दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल
और आज को हम
कभी भी जी न सके
इस कल के भंवर मे
उस स्वप्न के सफर मे
उम्र के इस पड़ाव मे
जल कल कुछ नहीं है ...
तो आज को देखता हूँ
तो आज मे भी कुछ नहीं पाता हूँ
बहुत थक गया हूँ
इस कल के चक्कर मे
आज ही मे जीवन है
कल का क्या ...
कल तो कल ही है ....

आए न आए ... 

जीवन का सफर .....

  
जीवन के आपाधापी मे
अच्छा और अच्छा होने की ललक मे
अम्मू से आमोद बनने
के सफर मे
जो भी मिला उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
साथ साथ चलते हुये
न जाने कितने स्नेह
कितने आत्मीयजन मिले
जिनका प्रतिबिंब आँखों मे
मेरी साँसों मे, खून मे
धमनियों में
अविरल गतिमान है
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
सफर के इस पड़ाव में
कितने हमसफर हमसे रूठे
उनकी हर बातें हमसे रूठी
उनका क्रोध, उनका प्यार
हमे मिला
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
जो मेरा था वो उनका था
उनकी सीख जो आज हमारी है
उन सभी का आशीर्वाद
जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया
उनकी मेहनत
जिसने ये दिन दिखाया
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
वाकई उनके बिना ये
सफर अधूरा था
अपूर्व था
आज इस मंजिल तक जिसने
पहुंचाया उन सभी हमसफर को मेरा
धन्यवाद !