शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

वो दिन कहाँ गए .....

शाम को जब मैं ऑफिस से घर को लौट रहा था ...... तो गाड़ी के शीशे से अनायास ही बहार की तरफ़ देख रहा था तो अचानक छोटे छोटे बच्चे जो आधे नंगे थे मिटटी मैं खेल रहे थे ........... क्या उल्लास था न कोई चिंता थी न कोई परवाह थी वहां थी तो केवल खुशी उनको देखार मैं भी अपने बचपन के दिनों मैं चला गया .... प्राईमरी स्कूल से आने के बाद अपनी तख्ती फेंककर नंगे पांव जब हम सब खेलने के लिए भागते थे हमारी मम्मी हम लोगों को खाना खिलाने के लिए हमारे पीछे पीछे भागती थी और हम सब भाग जाते थे मैदान मैं वहां हम सब चौर सिपाही और आईस पाईस खेलते थे और जब सूरज डूब जाता था तो डरते डरते घर की तरफ़ आते थे की आज तो पापा जरुर मारेंगे पर हमारी मम्मी हमको गोद मैं बैठाकर पुचकारते हुए खाना खिलाती थी।

अभी कुछ महीने पहले ही मुझे याद है बुखार हो गया था मम्मी मेरे पास ही बैठी रही थी पुरी रात । सुबह सबसे पहले उठकर मुझे सबसे पहले गरम पानी फिर चाय देती थी ...... लेकिन अब वो बात कहाँ घर में मम्मी की बस याद है सोफे के ठीक सामने मम्मी की फोटो लगी है मम्मी वहीं से सब देखती हैं मगर कुछ कहती नही हैं ...... सुबह आज भी होती हैं अन्तर इतना हैं की पहले गरम पानी के बाद चाय पिता था आज केवल चाय लेता हूँ। और भी चीजे हैं ............... अबी वो दिन कहाँ हैं ..............


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें