गुरुवार, 9 मई 2013

सूखा दरख़्त


जाओ तुमको तुम्हारे हाल पे 
मेने छोड़ दिया 
तुमको इससे ज्यादा में और 
दे भी क्या सकता था ... 
देखो इस   सूखे दरख्त को जिसने 
बहुत फल खिलाये थे .. पर… 
आज यहाँ परिंदा भी अपना  घोसला 
नहीं बनाता .. 
ये खड़ा है .. और कल शायद नहीं रहेगा ... 
लोग गुजर रहे हैं .. और गुजरते रहेंगे  भी .. 
ये दौरे सफ़र है .. आज मेरा है ... 
कल तेरा भी होगा . .. ..


6 टिप्‍पणियां:

  1. ये खड़ा है .. और कल शायद नहीं रहेगा ...
    लोग गुजर रहे हैं .. और गुजरते रहेंगे भी ..
    ये दौरे सफ़र है .. आज मेरा है ...
    कल तेरा भी होगा . .. .. दरखत को प्रतीक बना मन की भावनाओं को उकेरती अच्छी कविता

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  2. बहुत बहुत आभार आपका dr.mahendrag जी

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  3. वाह वाह क्या कहने ....

    ये दौरे सफ़र है .. आज मेरा है ...
    कल तेरा भी होगा . .. ..

    _____शानदार रचना


    जय हिन्द !

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  4. आदरणीय अलबेला खत्री जी आपका धन्यवाद् ....

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  5. निधि "लाडो" धन्यवाद् ....

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