बुधवार, 1 मई 2013


ये जो झुर्रियों के बीच...
चमकती थी ये आँखें.. 
मुझे अब भी इस मुकाम पे .. 
जवान बनाती थी ये आँखे ... 
मेरा मन, मेरा दिल, मेरा दिमाग ... 
सब पढ़ लेती थी ये आँखें... 
अब, जब सब है इस मुकाम पे ..
तब, गर कुछ नहीं है तो..
बस माँ... तू और तेरी वो आँखे..

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-05-2013) के "चमकती थी ये आँखें" (चर्चा मंच-1233) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति !

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    lateast post मैं कौन हूँ ?
    latest post परम्परा

    उत्तर देंहटाएं
  3. डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी आपका बहुत बहुत आभार.. चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपका धन्यवाद ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. श्रीमान मुकेश कुमार सिन्हा जी आपका बहुत बहुत आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्रीमान कालीपद प्रसाद जी आपका बहुत बहुत आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  6. Bahut achhi prastuti... marmik rachna.. dedicated to my great nani.....

    उत्तर देंहटाएं