बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ऐ मौला

जीवन कठिनाईयों मे 
गुजर रहा है ऐ मौला 
रात गुजर रही है 
बगैर नींद के ऐ मौला 
बेपरवाह एक जुगनू 
खलल डाल रहा ऐ मौला 
सफर मे चला जा रहा हूँ 
मंजिल की तलाश मे ऐ मौला
कहता बहुत हूँ, चीखता बहुत हूँ 
सुनता कोई नहीं ऐ मौला 
काली रात कटेगी, सुबह तो होगी 
इंतजार मे हूँ ऐ मौला 
जख्म इतना दिया कि 
इंतहा कि हद कर दी 
जख्म के दर्द का अहसास न रहा ऐ मौला
खारा हो गया हूँ जैसे समंदर का पानी 
अब मिठास की आस है ऐ मौला 
हमनवा, हमनवा न रहा 
हमसफर, हमसफर नहीं 
परछाई भी कतरा रही अब तो मौला .... 

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