मंगलवार, 19 मई 2009

शिकायत

तुम्हे मेरे साथ आने की
जरूरत क्या है
मैं गिर जाऊं उठाने की
जरूरत क्या है
ठोकर खाऊँ हज़ार बार
सहारा देने की जरूरत क्या है
लाख जख्मी होऊं
मरहम लगाने की जरूरत क्या है
तुमने ही तो कहा है
प्यार है हमेशा रहेगा
प्यार जताने की जरूरत क्या है

- विशु

यह कविता मेरी बहुत अच्छे दोस्त के द्वारा लिखी है

सोमवार, 4 मई 2009

एक शाम .....

शाम जब आती है
दिवाकर वक्त के परों पर
बैठकर
धीरे धीरे मुस्कराता हुआ
चला जाता है
तो तुम बहुत याद
आते हो
और उस लालिमा के
साथ ये दिल
भी डूबने लगता है .....
शाम के आने की
सूचना देते पक्षी
जब लौटते हैं
घोसलों को दरख्तों के
लंबे होते साये
पड़ते हैं जमीनों पर
तो अचानक ही तुम्हारी
याद आ जाती है
व्यतीत होता एक और दिन
समाप्त हो जाता है
और एक आशा आंसूं बनकर
आँखों मैं मुस्कराने लगती है
जब शाम आती है .........

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

राज नेता ......

सड़क पर लड़ते कुत्तों को देखकर
दिल मैं एक दर्द सो होता है
एक जाती के होने के बाद भी
लड़ते हैं ये
जैसे कोई राजनेता हों
सफ़ेद लिबास मैं लपेटे
देखे जा सकते हैं किसी
वातान्कुलित कर मैं
एक दुसरे पर गाली देते हुए
लगते हैं जैसे
सड़क के कुत्तों की तरहं
अन्तर इतना है की
सड़क के कुत्ते कटते कम
भोकते ज्यादा हैं
पर ये भोंकते भी हैं कटते भी हैं

बदल डालो इन्हें
हमको नही चाहिए सफाई
चिकनी चुपडी बातें
हमे चाहिए केवल
कुत्तों की वफादारी
देश के साथ
हमारे साथ
दे सकते हो तो दो
वरना रहने दो राज नेता कहलाने को ........

अंधेरे ......

ये अंधेरे ही तो मेरे अपने हैं
इनमें ही मेरी जिन्दगी के सपने हैं
लोग कहते हैं रात मैं होते हैं अंधेरे
जरा अपनी गहराई मैं जाकर देखो
तुम पाओगे अंधेरे
जब भी दिल बुझ जाता है तो होते हैं अंधेरे
वक्त बुरा आने पर
साथ छोड़ देते हैं उजाले
इन्हें अपना कर देखो
हमेशा तुम्हे गले से लगायेंगे अंधेरे .......

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

रिश्तो की गांठ ......

जीवन मैं दर्द
एक नही है
कभी गम
कभी त्रास
कभी कुंठा
कभी ख़ुद को झुठलाने वाला
रोज एक नया सपना है ।

जीवन सिर्फ़ एक चादर है
जिसमे भरा है गर्द गुबार
कुछ अपना
कुछ दूसरो के समान
कुछ कम का
बाकि बेकार ।

सब कुछ समेटकर
चादर मैं
लगा दी जाती है
रिश्तों की गांठ
ढोने के लिए
ता उम्र भर ।

एक छोटा सा कमजोर धागा
वजन पड़ने पर
नहीं संभाल पता है
ख़ुद को
और बन जाता है
चादर मैं छेद ।

चादर से हर रोज गिरता है
एक एक सामान
अंत मैं
रह जाती है
सिर्फ़ एक गांठ
कपड़ा
कितना कमजोर क्यों न हो
मुश्किल है तो
सिर्फ़
एक गांठ को खोल पाना .........

रिश्तो की गांठ

जीवन मैं दर्द
एक नही है
कभी गम
कभी त्रास
कभी कुंठा
कभी ख़ुद को झुठलाने वाला
रोज एक नया सपना है ।

जीवन सिर्फ़ एक चादर है
जिसमे भरा है गर्द गुबार
कुछ अपना
कुछ दूसरो के समान
कुछ कम का
बाकि बेकार ।

सब कुछ समेटकर
चादर मैं
लगा दी जाती है
रिश्तों की गांठ
ढोने के लिए
ता उम्र भर ।

एक छोटा सा कमजोर धागा
वजन पड़ने पर
नहीं संभाल पता है
ख़ुद को
और बन जाता है
चादर मैं छेद ।

चादर से हर रोज गिरता है
एक एक सामान
अंत मैं
रह जाती है
सिर्फ़ एक गांठ
कपड़ा
कितना कमजोर क्यों न हो
मुश्किल है तो
सिर्फ़
एक गांठ को खोल पाना .........

सम्बन्ध .....

कुछ कह रही हैं
आपके सिने की धड़कने
मेरा नही तो
उनका कहा मानिये
हर शाम तरसती है
आँखों मैं लिए सपना
आमोद को कोई
तो खाए अपना
आमोद को पतझडों का
सहारा ही बहुत था
तू बता तुझे
बहारों से क्या मिला
जीवन वो भी क्या जीवन है
जिसने विष का घूंट न पीया
आमोद सम्बन्ध नही है
की जोड़कर तोड़ दिया जाए
इस तरह से रोने से गम
और घनेरा होगा
रत कसे बाद
सबेरा होगा
वक्त गर तुझसे
खफा है तो तू अफ़सोस न कर
आमोद किसी का न हुआ
तो कैसे
वो तेरा होगा ...... ....... .....