गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

याद मे

हम छोटे छोटे थे 
जब माँ 
कोयले की राख़ से 
गोले बनाती थी 
हम भी बैठे बैठे 
गोले बनाते थे 
ये वाला मेरा 
ये वाला तेरा 
मेरा गोला ज्यादा मोटा 
तेरा वाला पतला गोला 
धूप मे गोले 
फैला दिये जाते 
सूरज अपनी तपन से 
हवा अपने वेग से 
गोले को सूखा देते 
शाम को अम्मा 
उन्हे उठाती 
तब भी हम लड़ते 
ये तेरा वाला 
ये मेरा वाला 
अंगीठी मे एक एक करके 
गोले जलाये जाते 
ये तेरा वाला गया 
ये मेरा वाला गया 
आज जब माँ नहीं है 
गोला नहीं है 
अंगीठी भी नहीं है 
तेरा वाला नहीं है 
मेरा वाला नहीं है 
बस दहक रहा हूँ  आग मे 
खाक होने की आस मे 

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