बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

जद्दोजहद

हर रोज दुआएं मांगता हूँ रब से ....
घोसला टूट जाता है हवाओं से ...
जब होना है जो मुकद्दर में है
तो दिमाग की कलम हांथ मे क्यूँ हैं
कैसे कहूँ, ये तो होना ही है
4 के बाद 5  तो आना ही है
किस कदर गुजारी है ये तमाम उम्र
बरगद की जटाएँ खुद बयां करती हैं
हर रोज बस एक ही दुआ होती है
शाम होती है सुबह वही दुआ होती है .... 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

हमसफर को मेरा धन्यवाद

जीवन के आपाधापी मे
अच्छा और अच्छा होने की ललक मे
अम्मू से आमोद बनने
के सफर मे
जो भी मिला उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
साथ साथ चलते हुये
न जाने कितने स्नेह
कितने आत्मीयजन मिले
जिनका प्रतिबिंब आँखों मे
मेरी साँसों मे, खून मे
धमनियों में
अविरल गतिमान है
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
सफर के इस पड़ाव में
कितने हमसफर हमसे रूठे
उनकी हर बातें हमसे रूठी
उनका क्रोध, उनका प्यार
हमे मिला
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
जो मेरा था वो उनका था
उनकी सीख जो आज हमारी है
उन सभी का आशीर्वाद
जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया
उनकी मेहनत
जिसने ये दिन दिखाया
उन हमसफर को मेरा
धन्यवाद !
वाकई उनके बिना ये
सफर अधूरा था
अपूर्व था
आज इस मंजिल तक जिसने
पहुंचाया उन सभी हमसफर को मेरा
धन्यवाद !


शनिवार, 9 अगस्त 2014

कल तो कल है ....

आज बुरा है !!!
तो क्या हुआ ...
कल अच्छा होगा
बहुत सुना है
बहुत गुना है
कल जरूर अच्छा होगा
और हम भागते रहे
उसी कल की  ओर
उसी अच्छे की ओर
रोज सपने देखते रहे
सँजोते रहे
बुनते रहे, गुनते रहे ...
उस अच्छे के लिए
एक एक दिन गुजरता रहा
हम इत्ते से उत्ते भी हो गए
और कल हमेशा
कल ही रहा ....
दौड़ता रहा... भागता रहा
हुयी रात तो सबेरा भी हुआ
मगर न आया
तो वो सुनहरा कल ...
समय बदला, दिन बदला
जगह बदली, लोग बदले
यहाँ तक कि हम भी बदले
लेकिन न मिला तो केवल वो कल
और आज को हम
कभी भी जी न सके
इस कल के भंवर मे
उस स्वप्न के सफर मे
उम्र के इस पड़ाव मे
जल कल कुछ नहीं है ...
तो आज को देखता हूँ
तो आज मे भी कुछ नहीं पाता हूँ
बहुत थक गया हूँ
इस कल के चक्कर मे
आज ही मे जीवन है
कल का क्या ...
कल तो कल ही है ....
आए न आए ...







रविवार, 3 अगस्त 2014

मनन ...

डरी, सहमी सी लगती है
अंदर जो आवाज है
जिसे अन्तरात्मा कहते हैं
वो चुप है
इस निःशब्द वातावरण मे
वह चीख बनके
निकलेंगे कब ?
जिंदगी, आखिर ....
शुरू होगी कब ?
खुले मन से हँसी
आएगी कब ?
कब खिलखिलाकर
सच सच कहूँ तो
दाँत निपोर कर
आखिर हँसेंगे कब ?
बरसों से इस जाल मे बंधी
उसी राह पर चलते – चलते
आखिर हम बदलेंगे कब ?
थोड़ी आस,
थोड़ा विश्वास
धीरे धीरे पिघलता मन
आखिर कितना बचेगा ?
डर है मुझे ...
इस मुखौटे को पहनकर
दिखावा कर के
मेरा धीरज न टूट जाए
स्वयं ही स्वयं के
सृजन को आखिर
बचाऊँ मे क्यूँ ?
कल आखिर बस
इस जहां में एक
किस्सा रह जाऊंगा ...
इतिहास बन जाऊंगा ...
अपने ही अक्स में
अपनी को ही मार डालूँगा
आखिर क्यूँ ?....

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

डायरी और उसके पन्ने ....



धूल में दबी हुयी ये डायरी
जिसकी एक एक परत की हैं ये यादें
हर एक सफा तुम्हारी याद है
.... न जाने कहाँ कहाँ रखा उसे
..... आलमारी मे ठूसा
..... बक्से में दबाया
.... ऊपर टाँड़ पर रखा
अटैची मे रखा ....
उसके पन्नों के रंग उतर गए
मगर लिखावट वही रही
आज भी देखकर उन सफ़ों को
और आपके उन हिसाबों को देखकर
उन हिसाबों मे हमारा भी अंश हैं
जिन्हे आज देखकर महसूस करता हूँ
उन सफ़ों पे लिखा आपका हिसाब
दूध वाले को  - 65 रुपये
सब्जीवाले को  - 120 रुपए
टाफी में  - 2 रुपए
बच्चों की फीस  - 20 रुपये
और भी बहुत कुछ
आज से इसका गहरा संबंध  है
इन सफ़ों में आपकी ममता की जो खुशबू है
डायरी की एक एक परत मे जो छिपा है
वह हमारे जाने के बाद भी बोलेगा
यादें आदमी के जाने के बाद भी बोलती हैं
इन पन्नों को सहेज दो
बंद कर दो, क्यूंकी
माँ की याद तो आ गई
मगर माँ .... ...

सोमवार, 28 जुलाई 2014

बैठक .....

याद आता है 
वो अपना दो कमरे का घर 
जो दिन मे 
पहला वाला कमरा 
बन जाता था 
बैठक .... 
बड़े करीने से लगा होता था 
तख़्ता, लकड़ी वाली कुर्सी 
और टूटे हुये स्टूल पर रखा 
होता था उषा का पंखा
आलमारी मे होता था 
बड़ा सा मरफ़ी का 
रेडियो ... 
वही हमारे लिए टी0वी0 था 
सी0डी0 था और था होम थियेटर 
कूदते फुदकते हुये 
कभी कुर्सी पर बैठना 
कभी तख्ते पर चढ़ना 
पापा की गोद मे मचलना ...
मेहमानों का लगातार आना 
और मम्मी का लगातार 
चाय बनाना .... 
बहनों द्वारा बनाई गई 
पेंटिंग जो 
बैठक की शान हुआ करती थी 
सारे दिन कोई न कोई तारीफ 
करता ही रहता था 
चाहे वो  "आयुब चाची" हों 
या "सुलेमान" मास्टर 
समय बीता.... 
सपने कुछ बढ़े 
बैठक को सँवारने 
मे हम सभी कुछ न कुछ करते ही रहते थे 
मम्मी की पुरानी साड़ियों 
से बनाए परदे 
इसी का नतीजा थी 
और इस तरह सजने और सँवरने  लगी हमारी प्यारी 
बैठक ... 
सुंदर बैठक के सपने 
बनते और पनपते रहे 
उन सपनों के जंजाल 
को लिए न जाने कितने वर्ष 
यूं ही  बीत गए......  
समय के साथ फंगशुयी, वास्तु की 
बारीकियाँ भी पढ़ता रहा गुनता रहा 
सजाता रहा अपनी 
बैठक ..... 
अब वो लकड़ी वाली कुर्सी 
की जगह कलात्मक गद्देदार 
सोफ़े हैं ...
सुंदर सी मेज है ... 
वास्तु के अनुसार 
मछ्ली का इक्वेरियम भी लगा है 
और तो और 
मम्मी पापा की सुंदर फोटो 
भी बैठक में घुसते सामने नहीं 
लगा सका ... 
वास्तु के दोष के कारण 
वो भी एक तरफ दीवाल पर चिपकी हुयी है 
जो लगातार यह सब देख रही है 
बहुत दुःख होता है 
जिसने हमे इस काबिल करा 
उनकी फोटो भी सामने नहीं 
लगा सका ..... 
बैठक को बहुत ही 
नज़ाकत से रखा है 
चमचमाता हुआ सफ़ेद फर्श है 
बहुत करीने से सफाई दोनों टाईम 
होती है .... 
तमाम चीजें बड़ी नफासत से 
रखी हुयी है ... 
पर नहीं आता है अब ... 
कोई मेहमान 
समय की कमी के 
कारण .... 
कोई आता भी है 
तो बहुत जल्दी में 
दरवाजे से ही लौटा दिया जाता है 
खड़े - खड़े ... 
विदा कर दिया जाता है ....
महल जैसी बैठक में 
बैठने -उठने के 
नियम तय किए गए हैं 
हर किसी को 
थोड़े ही बैठाया जाता है 
बैठक में 
उन गद्देदार सोफ़ों पर 
इसलिए .... 
न सजते हैं काजू 
अब प्लेटों में 
न ट्रे मे चाय सजती है 
और बैठक हमारी बंद ही रहती है 
मिट्टी के डर से 
कहीं गंदी न हो जाये 
बैठक ..... 
                                                                                


मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

अंतिम दर्शन

वो गंगा की धारा 
वो निर्मल किनारा 
जहाँ माँ थी लेटी
हमें कुछ न कहती 
हमें याद है वो 
निर्मल सा चेहरा 
अभी कुछ था कहना 
अभी कुछ था सुनना 
याद आ रहा था 
माँ का तराना 
जिसे गाया करती थी 
माता हमारी ... 
उठाया करती 
वो गाकर तराना 
मगर आज वो लेटी 
हमे कुछ न कहती 
पानी था निर्मल 
वो अश्रु की धारा 
रोके न रुकी थी 
वो आँखों की धारा 
वही था वो सूरज 
वही था किनारा 
मैंने माँ को देखा 
जैसे वो हंसी थी
मगर वो थी लेटी 
हमें कुछ न कहती 
खत्म हो रहा था 
वो सूरज का तेवर
वो चिता का जलाना 
वो दिल का पिघलना 
जहाँ माँ थी लेटी 
बचा कुछ नहीं था 
वही था किनारा 
वही थी वो धारा 
बची बस वो यादें 
माँ की पुरानी 
जिसे लेकर बैठा 
मैं अब भी किनारे .... 
मेरी माँ बसी है 
मेरे मन के अंदर .... 
मुझे याद  आ रहा था 
माँ का वो तराना .... 
उठ जाग मुसाफिर भोर भयी ......