गुरुवार, 21 नवंबर 2013

कैसा लगता है ....

बताओ तो, कि कैसा लगता है ... 
किसी अंजान जगह पर 
किसी अंजान सफर पर 
किसी अंजान का साथ 
खुशी के वो अंजान पल 
साथ गुज़ारना, साथ चलना 
वो एहसास, वो पल 
बताओ तो, कि कैसा लगता है .... 
और फिर अचानक ... 
एक दिन 
किसी अंजान का बिछड़ जाना 
किसी अंजान बातों पर 
किसी अंजान कारणो पर 
फिर लौट कर न आना 
सिर्फ इंतज़ार रह जाना 
किसी से कुछ न कह पाना 
सिर्फ और सिर्फ यादें रह जाना 
बताओ तो, कि कैसा लगता है ..... 

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सलाम अर्ज है ....

सुनो !!
वक्त मत लिया करो ... 
समय से तारीफ करा करो 
हाँ मगर सच्ची तारीफ़ें 
और समय से मुबारकें 
तुम्हारी दुआ कबूल हो 
उस खुदा को मंजूर हो 
जिसने मुझे भेजा यहाँ 
तुम जैसे दोस्तों के दिलों में
मिला एक आसियाँ
मैं कितना भी उड़ लूँ 
आज मगर सच कहता हूँ 
प्यार से अपने बांध लेते हो 
वरना मैं क्या होता हूँ 
मुस्कराहट में मेरी, तुम्हारी नज़र है 
कलम से कुछ नाराज़ अक्षर हैं 
वरना कहाँ मैं तुमसे दूर रह पाता हूँ 
एक डोर से बंधा चला आता हूँ 
खुदा तुम्हें भी सलामत रखें 
ओ... मेरे अंजान साथियों 
जो तुमसे मिला वो कर्ज है 
मुझे लाजवाब कर देने वालों
तुम्हें मेरा सलाम अर्ज है ....  

बाजार ....

यहाँ परछाईयों का सौदा होता है

हर चीज यहाँ बिकाऊ है

हर पल तमाशा लगता है

तुम अपना दाम कहो

छुप के नहीं खुले आम कहो

क्या लोगे अपनी यारी का

क्या लोगे अपनी दिलदारी का

मेरा गम लोगे कितने में

तुम प्यार करोगे कितने में

सब जज़बात तुम मेरे नाम करो

हमराही तुम अपना दाम कहो

पर दाम चुकाने के खातिर

हम अपनी जेब टटोलें तो

बस प्यार मिलेगा बहुत सारा

पर ये सिक्के अब कहाँ चलते हैं

ये दुनिया बे-एतबारी की .....

ये अर्ज है हर व्यापारी की…

गुफ्तगू...

जो बातें होठों तक न आ पाएँ 
उसे कागजों पर 
उकेरा करो .... 
दिल में न रखा करो 
ओंठ न सिया करो 
कुछ बातें लिखनी मुश्किल हो 
तो आँखों से कह दिया करो 
जब तन्हा हुआ करो 
तो आवाज़ दिया करो 
जो हसरत तेरी चाहत मे हो 
मेरे दामन से ले लिया करो 
गुफ्तगू
जम कर किया करो ....

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

टूटकर उसे बहुत याद आ रहा है ....

ये सच है, 
पुराना जाता नहीं तो 
नया पत्ता आता नही 
पर पुराना जब 
टूट के जाता है 
तो उसे बहुत याद आता है 
कल तक जिस टहनी पर 
वह इतना इतराता था 
इतना इठलाता था 
आज बेबस पड़ा है 
सड़कों पर आ खड़ा है 
जरा सी हवा आई 
और उड़ा ले गई ...
कल तक जिस हवा का 
आँचल सहलाता था 
आज वही हवा 
उसे दर-बदर कर रही है 
तकदीर बदलते 
देर नहीं लगती 
कल तक हारा था 
आज धूप मे पड़ा 
खड़खड़ा रहा है 
टूटकर उसे  बहुत याद आ रहा है .... 

रविवार, 18 अगस्त 2013

पता नहीं .......


...................... पता नहीं कोई आपके स्मृति पटल में न जाने क्यूँ और एक अजीब तरह से क्यूँ रहने लगते हैं। कुछ बहुत ही अटपटे कारणों से, कुछ तो अनायास ही घर बना लेते हैं जिसका स्पष्टीकरण शायद आप नहीं दे सकते ...... जैसे मेरठ में जब मैं रहता था तो वो भिखारी जिसकी कर्कश आवाज दे ...... दे ...... माई........ दे …… दे ...बाबू साहब कुछ तो दे ............ दे .... वो भिखारी माई तो कहता था .....मगर दे ..... दे....बापू नहीं कहता था .... क्यूँ नहीं कहता था इसका जवाब आज तक नहीं खोज पाया.......... खैर उसका सभी घरों को छोड़कर मेरे घर तक आना और उसके आने के बाद मैं उसको देखते ही न जाने क्यूँ जो भी होता था जेब में दे दिया करता था ..... और कई बार तो रास्ते में भी मिल जाया करता था और में आदतन उसे कुछ न कुछ जरूर देता था ...... पता नहीं क्यूँ ? शायद उससे कोई रिश्ता रहा हो पुराना........... अचानक कई महीनों तक वो नहीं दिखा और जैसे अचानक ही गायब हुआ था वो, अचानक ही आ गया और अपने कॉपीराइट आवाज में मांगता हुआ मैंने पूछा कि कहाँ थे इतने दिन तक वो बोला अल्सर हो गया था साहब पेट में और फिर वो चला गया .......... जो आजतक नहीं मिला ..... आज भी पता नहीं क्यूँ वो बहुत याद आता है।

आपके जीवन में भी कुछ लोग ऐसे शामिल होते हैं जो आपको दुबारा नहीं मिलते मगर यादें उनकी जेहन में हमेशा रहती हैं ...पता नहीं क्यूँ...........

सोमवार, 5 अगस्त 2013

अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति



दोस्तों, बहुत जल्द ही मेरा काव्य संकलन "अभिव्यक्ति" जो मैंने अपने दिवंगत माता पिता को समर्पित करा है वो प्रकाशित होने जा रहा है ... उसी संदर्भ मे एक महान विभूति डा0 विजय कुमार सक्सेना जी से मुलाक़ात हुई आदरणीय विजय जी ने मेरे इस काव्य संकलन के बारे मे अपने उद्गार दिये ..... जो निम्न है :-

उभरते हुये युवा कवि आमोद कुमार श्रीवस्तवा के काव्य संकलन “अभिव्यक्ति” की पाण्डुलिपि को देखने पढ़ने का सुअवसर मिला इस हेतु अपने को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे इस अवलोकन के बहाने  से यह समझने का असर  मिला कि लगभग एक सदी का सफर तय कर चुकी हिन्दी की नई कविता का कवि आज क्या सोच रहा है ? आज क्या लिख रहा है ?

अपनी अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति के लिए इस नए कवि ने माध्यम चुना नई कविता को इस मे वह पूर्ण सफलता मिली है इस हेतु मैं कवि को बधाई देता हूँ। आमोद ने नई कविता  को यथार्थवादी  दार्शनिक पृष्ठभूमि  प्रदान की है। यूं तो हर सुकवि शुरुवात तो स्वांतः सुखाय से ही करता है पर वह आखिर है तो मनुष्य ही  उसकी रचना पूर्ण होते होते  पूरी तरह  परानतः सुखाय  हो ही जाती है।  उदाहरणर्थ महाकवि तुलसी कृत रामचरित मानस। कवि आमोद अपने माता-पिता की स्मृति में प्रारम्भ हुई अपनी काव्य यात्रा को अनायास  व अप्रयास परानतः सुखाय बना देते हैं उनके माता-पिता की स्मृति पाठक को अपने माता-पिता की स्मृति सी लगती है यह कवि की दूसरी सफलता है।

इस युवा कवि में उफान है, कुछ करने की बेचैनी है इस बेचैनी को वह तरह तरह  से अभिव्यक्त करना चाहता है, उसे  सफलता भी मिलती है पर कहीं कहीं  यथार्थ की आधारशिला पर वह इतिवृत्ता दोष(Matter of fact) का शिकार हो जाती है।

कवि अपने दर्शन को प्रतिपादित करते हुये दार्शनिक ढोंग का भी पर्दाफाश करता प्रतीत होता है। ऐसा करते हुए  वह गीता के कृष्ण के कर्मयोग का ही यथार्थ के धरातल पर मृत्यु के भय से निर्भय हो कर कर्म करने का संदेश देता है, एक और सफलता है  कवि की कबीर की भांति उस ने ईश्वर को माता, पिता, प्रेयसी, प्रेमी, भाई  के विविध रूपों का सफल चित्रण भावपूर्ण कविता से किया है।

यादें से प्रारम्भ करते हुये फुदकती हुई गोरेय्या  तक कुल 94 कविताओं में रोचक, सार्थक, भावपूर्ण चित्रण हुआ है जो पाठक को आदि से अंत तक जोड़े  रखता है यह भी कवि की सफलता है।

इस वृहत और नवीन साहित्यिक  स्थापनाओं वाले काव्य संकलन  की उचित समीक्षा एवं मूल्यांकन के लिए समय और सुअवसर  चाहिए। समयाभाव कवि के पास तो है ही और समयाभाव मी पास भी है।  मुझे यह पाण्डुलिपि  मात्र एक दिन  को ही मिल पाई है  और मैं इन दिनों  रोहिलखंड के अज्ञात  इतिहास  पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक की रचना करने में व्यस्त हूँ। अतः में यह चाहूँगा कि पुस्तक  प्रकाशन उपरांत यह अवसर  मुझे लेखक और प्रकाशक यथा शीघ्र दे सकें तो मैं उपकृत होऊंगा।

हाँ एक और बात कहना चाहूँगा कि इन 94 कविताओं  में कहीं भी सामाजिक/राजनैतिक दशाओं का कोई चित्रण नहीं दिखा,  मुझे यह विश्वाश है कि  इस काव्य संकलन  का हिन्दी साहित्य  जगत में  नई धारा  कवि को स्वतः ही इस पर आगे  कि काव्य यात्रा में विचार करना चाहिए व में यह समझता हूँ कि यह कृति नई कविता को एक अभिनव रूप देने में सक्षम होगी।

शुभ कामनाओं सहित।



डाo विजय कुमार सक्सेना

एम.., साहित्य रत्न