गुरुवार, 25 जून 2015

गर्मी बहुत है ....

सुनो, 
गर्मी बहुत है 
अपने अहसासों की हवा 
को जरा और बहने दो 
यादों के पसीनों को 
और सूखने दो 
सुनो, 
गर्मी बहुत है 
गुलमोहर के फूलों 
से सड़कें पटी पड़ी हैं 
ये लाल रंग 
फूल का 
सूरज का 
अच्छा लगता है 
अपने प्यार की बरसात को 
बरसने दो 
बहुत प्यासी है धरती 
बहुत प्यासा है मन 
भीग जाने दो 
डूब जाने दो 
सुनो,
गर्मी बहुत है .... 

मंगलवार, 23 जून 2015

खेल और उसका खेला ...

 शाम हो रही है 
सूरज का तेज अब 
मध्यम होता जा रहा है 
शाम और खेल 
का बड़ा अनूठा 
सायोंग है 
अब बस याद ही है 
खेल और उसका खेला की 
एक खेल था 
ऊंच-नीच 
समान्यतः यह खेल घर
के आँगन मे ही 
खेलते थे, चबूतरे पर 
नाली की पगडंडियों पर 
हम सब ऊपर रहते थे 
और चोर नीचे 
हमे अपनी जगह बदलनी होती थी
और चोर को हमे छूना होता था 
अगर छु लिया तो 
चोर हमे बनना होता था 
बड़ा मजा था 
कई बार तो हम जान बूझकर 
चोर बन जाया करते थे 
मज़े के लिए 
आखिर खेल ही तो था 
आज भी ऊंच-नीच का खेल 
खेल रहे हैं हम सब
वो ऊंच हैं वे नीच हैं 
मगर आँगन मे नहीं 
मन मे 
खेल तो खेल है 
और उसका अपना मज़ा है ... 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

याद मे

हम छोटे छोटे थे 
जब माँ 
कोयले की राख़ से 
गोले बनाती थी 
हम भी बैठे बैठे 
गोले बनाते थे 
ये वाला मेरा 
ये वाला तेरा 
मेरा गोला ज्यादा मोटा 
तेरा वाला पतला गोला 
धूप मे गोले 
फैला दिये जाते 
सूरज अपनी तपन से 
हवा अपने वेग से 
गोले को सूखा देते 
शाम को अम्मा 
उन्हे उठाती 
तब भी हम लड़ते 
ये तेरा वाला 
ये मेरा वाला 
अंगीठी मे एक एक करके 
गोले जलाये जाते 
ये तेरा वाला गया 
ये मेरा वाला गया 
आज जब माँ नहीं है 
गोला नहीं है 
अंगीठी भी नहीं है 
तेरा वाला नहीं है 
मेरा वाला नहीं है 
बस दहक रहा हूँ  आग मे 
खाक होने की आस मे 

बुधवार, 11 मार्च 2015

कारवां देखते रहे

उम्मीद तो 
मुझे अपने आप से भी थी 
उम्मीद तो 
मुझे अपनों से भी थी ... 
सोचता तो 
अपने के लिए भी था 
सोचता तो 
दूसरों के लिए भी था 
सुधार की गुंजाईश 
अपने आप से भी थी 
सुधार की गुंजाईश 
दूसरों से भी थी 
इन्हीं ... 
उहापाहो में
सफर काटता रहा ... 
जब उम्मीद 
अपनी पूरी नहीं हुयी 
सोच अपनी न रही 
सुधार खुद को न पाया 
तो शिकायत 
अब किससे 
और क्यूँ 
जीवन का फलसफा 
यूं ही गुजरता रहा 
और हम कारवां देखते रहे .... 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

ऐ मौला

जीवन कठिनाईयों मे 
गुजर रहा है ऐ मौला 
रात गुजर रही है 
बगैर नींद के ऐ मौला 
बेपरवाह एक जुगनू 
खलल डाल रहा ऐ मौला 
सफर मे चला जा रहा हूँ 
मंजिल की तलाश मे ऐ मौला
कहता बहुत हूँ, चीखता बहुत हूँ 
सुनता कोई नहीं ऐ मौला 
काली रात कटेगी, सुबह तो होगी 
इंतजार मे हूँ ऐ मौला 
जख्म इतना दिया कि 
इंतहा कि हद कर दी 
जख्म के दर्द का अहसास न रहा ऐ मौला
खारा हो गया हूँ जैसे समंदर का पानी 
अब मिठास की आस है ऐ मौला 
हमनवा, हमनवा न रहा 
हमसफर, हमसफर नहीं 
परछाई भी कतरा रही अब तो मौला .... 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

मुझे पागल कर दो

सुनो ,
है ईश्वर ऐसा करो
मुझे पागल कर दो
शरीर से दिमाग का
संपर्क खत्म कर दो
मेरे एहसास
मेरी प्यास
मेरी तृष्णा
मेरा प्यार
मेरी लालसा
से मेरा नाता खत्म कर दो
न मर्म रहे
न भावना
न दर्द रहे
न रोग . . . .
सुनो . . . .
है ईश्वर ऐसा करो
मुझे पागल कर दो
जीवन तो तब भी रहेगा
दौड़ेगा रगों मे खून
देखुंगा, सुनुंगा
खा भी लूँगा
दोगे कपड़े तो पहन
भी लूँगा
न होगा तो केवल
एहसास . . . .
अपने और दूसरे
की पहचान
अच्छा क्या
खराब क्या
ईर्ष्य क्या
दुलार क्या
अपना कौन
कौन बैगाना
भूख है क्या
प्यास क्या . . . .
और ये सब जब थे . . .
तभी क्या था . . .
सुनो . . .
है ईश्वर ऐसा करो
मुझे पागल कर दो . . . .

रविवार, 21 दिसंबर 2014

फ़ासलों के बावजूद

ईतनी घुटन क्यूँ हैं ... 
घर मे खिड़कियों के बावजूद 
जिंदगी उदास क्यूँ हैं 
खुशियों के बावजूद 
हमें बांटने वालों तुम्हें मालूम हों 
आकाश कायम रहेगा 
दीवारों के बावजूद 
हमने उसका दामन तक 
छुआ नहीं था कभी 
वो मेरे सबसे निकट था 
फ़ासलों के बावजूद ...